दर Poetry (page 72)

ज़िंदगी मेरी मुझे क़ैद किए देती है

अज़्म शाकरी

ये जो दीवार अँधेरों ने उठा रक्खी है

अज़्म शाकरी

ख़ाक उड़ाते हुए ये म'अरका सर करना है

अज़्म शाकरी

घर में चाँदी के कोई सोने के दर रख जाएगा

अज़्म शाकरी

दरीदा-पैरहनों में शुमार हम भी हैं

अज़्म शाकरी

उस आँख से वहशत की तासीर उठा लाया

अज़्म बहज़ाद

मुझे कल अचानक ख़याल आ गया आसमाँ खो न जाए

अज़्म बहज़ाद

मैं उम्र के रस्ते में चुप-चाप बिखर जाता

अज़्म बहज़ाद

बे-हद ग़म हैं जिन में अव्वल उम्र गुज़र जाने का ग़म

अज़्म बहज़ाद

दूसरा रुख़ नहीं जिस का उसी तस्वीर का है

अज़लान शाह

सोज़िश-ए-ग़म के सिवा काहिश-ए-फ़ुर्क़त के सिवा

अज़ीज़ वारसी

आख़िर-ए-शब वो तेरी अंगड़ाई

अज़ीज़ वारसी

सफ़र मुदाम सफ़र

अज़ीज़ तमन्नाई

हयूला

अज़ीज़ तमन्नाई

यूँही कटे न रहगुज़र-ए-मुख़्तसर कहीं

अज़ीज़ तमन्नाई

करो तलाश हद-ए-आसमाँ मिलने न मिले

अज़ीज़ तमन्नाई

जिस को चलना है चले रख़्त-ए-सफ़र बाँधे हुए

अज़ीज़ तमन्नाई

रसूल-ए-काज़िब

अज़ीज़ क़ैसी

उस की सोचें और उस की गुफ़्तुगू मेरी तरह

अज़ीज़ नबील

सुनो मुसाफ़िर! सराए-जाँ को तुम्हारी यादें जला चुकी हैं

अज़ीज़ नबील

मोजज़े का दर खुला और इक असा रौशन हुआ

अज़ीज़ नबील

दश्त-ओ-सहरा में समुंदर में सफ़र है मेरा

अज़ीज़ नबील

आतिश-ए-ख़ामोश

अज़ीज़ लखनवी

ये ग़लत है ऐ दिल-ए-बद-गुमाँ कि वहाँ किसी का गुज़र नहीं

अज़ीज़ लखनवी

मेरे रोने पे ये हँसी कैसी

अज़ीज़ लखनवी

क्यूँ न हो शौक़ तिरे दर पे जबीं-साई का

अज़ीज़ लखनवी

एक ही ख़त में है क्या हाल जो मज़कूर नहीं

अज़ीज़ लखनवी

दिल कुश्ता-ए-नज़र है महरूम-ए-गुफ़्तुगू हूँ

अज़ीज़ लखनवी

देख कर हर दर-ओ-दीवार को हैराँ होना

अज़ीज़ लखनवी

उठाईं हिज्र की शब दिल ने आफ़तें क्या क्या

अज़ीज़ हैदराबादी

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