दर Poetry (page 71)
हमें देखा न कर उड़ती नज़र से
बकुल देव
दर्द-ए-हिजरत के सताए हुए लोगों को कहीं
बख़्श लाइलपूरी
समुंदर का तमाशा कर रहा हूँ
बख़्श लाइलपूरी
रुत न बदले तो भी अफ़्सुर्दा शजर लगता है
बख़्श लाइलपूरी
कोई शय दिल को बहलाती नहीं है
बख़्श लाइलपूरी
हम-कलामी में दर-ओ-दीवार से
बहराम तारिक़
किया है संदलीं-रंगों ने दर बंद
बहराम जी
कब तसव्वुर यार-ए-गुल-रुख़्सार का फ़े'अल-ए-अबस
बहराम जी
हो चुका वाज़ का असर वाइज़
बहराम जी
या मुझे अफ़सर-ए-शाहाना बनाया होता
ज़फ़र
टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच
ज़फ़र
निबाह बात का उस हीला-गर से कुछ न हुआ
ज़फ़र
मर गए ऐ वाह उन की नाज़-बरदारी में हम
ज़फ़र
क्या कहूँ दिल माइल-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँकर हुआ
ज़फ़र
गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार है
ज़फ़र
गुम हुए जाते हैं धड़कन के निशाँ हम-नफ़सो
बद्र-ए-आलम ख़लिश
दमक उठी है फ़ज़ा माहताब-ए-ख़्वाब के साथ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
दीवार-ओ-दर का नाम था कोई मकाँ न था
बदनाम नज़र
है बहुत मुश्किल निकलना शहर के बाज़ार में
बदीउज़्ज़माँ ख़ावर
भागते सूरज को पीछे छोड़ कर जाएँगे हम
बदीउज़्ज़माँ ख़ावर
घर में रहते हुए डर लगता है
बीएस जैन जौहर
घर में रहते हुए डर लगता है
बीएस जैन जौहर
इक हूक सी जब दिल में उट्ठी जज़्बात हमारे आ पहुँचे
बीएस जैन जौहर
मसअले ज़ेर-ए-नज़र कितने थे
अज़रा वहीद
ग़ुबार-ए-जाँ पस-ए-दीवार-ओ-दर समेटा है
अज़रा वहीद
बे-ख़ुदा होने के डर में बे-सबब रोता रहा
अज़रा परवीन
आसमाँ साहिल समुंदर और मैं
अज़रा परवीन
ख़्वाब-जंगल
अज़रा नक़वी
मो'तबर से रिश्तों का साएबान रहने दो
अज़रा नक़वी
एक नज़्म रोज़ आती है
अज़रा अब्बास
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