दर Poetry (page 69)

तेरा सितम जो मुझ से गदा ने सहा सहा

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

मैं तिरे डर से रो नहीं सकता

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

हयात-ओ-मौत का इक सिलसिला है

बासित भोपाली

हम जैसे तेग़-ए-ज़ुल्म से डर भी गए तो क्या

बासिर सुल्तान काज़मी

हर-चंद मेरे हाल से वो बे-ख़बर नहीं

बासिर सुल्तान काज़मी

कभी दर पर कभी है रस्ते में

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

लड़ ही जाए किसी निगार से आँख

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

है दुनिया में ज़बाँ मेरी अगर बंद

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

ज़ाहिर मिरी शिकस्त के आसार भी नहीं

बशीर सैफ़ी

इस बहर-ए-बे-सदा में कुछ और नीचे जाएँ

बशीर सैफ़ी

रुख़ तुम्हारा हो जिधर हम भी उधर हो जाएँगे

बशीर महताब

मैं ने दिन रात ख़ुदा से ये दुआ माँगी थी

बशीर बद्र

शबनम के आँसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ

बशीर बद्र

सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है

बशीर बद्र

मेरी आँखों में तिरे प्यार का आँसू आए

बशीर बद्र

फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है

बशीर बद्र

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा

बशीर बद्र

मुब्तला-ए-इ'ताब हैं हम लोग

बशीरुद्दीन राज़

सोए हुए जज़्बों को जगा कर फिर वो शाम न आई

बशीर मुंज़िर

हम बयाबानों में घूमे शहर की सड़कों पे टहले

बशीर मुंज़िर

होगा क्या चाँद-नगर सोचते हैं

बशीर मुंज़िर

इन चटख़्ते पत्थरों पर पाँव धरना ध्यान से

बशीर अहमद बशीर

हर गाम पे आवारगी-ओ-दर-ब-दरी में

बशीर अहमद बशीर

दूर तक चारों तरफ़ मेरे सिवा कोई न था

बशीर अहमद बशीर

ऐसा तह-ए-अफ़्लाक ख़राबा नहीं कोई

बशीर अहमद बशीर

वक़्त के कटहरे में

बशर नवाज़

विसाल

बशर नवाज़

मुझे जीना नहीं आता

बशर नवाज़

छेड़ा ज़रा सबा ने तो गुलनार हो गए

बशर नवाज़

आहट पे कान दर पे नज़र इस तरह न थी

बशर नवाज़

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