दर Poetry (page 73)

खुला ये दिल पे कि तामीर-ए-बाम-ओ-दर है फ़रेब

अज़ीज़ हामिद मदनी

काज़िब सहाफ़तों की बुझी राख के तले

अज़ीज़ हामिद मदनी

ज़ंजीर-ए-पा से आहन-ए-शमशीर है तलब

अज़ीज़ हामिद मदनी

ये फ़ज़ा-ए-साज़-ओ-मुज़रिब ये हुजूम-ताज-ए-दाराँ

अज़ीज़ हामिद मदनी

वही दाग़-ए-लाला की बात है कि ब-नाम-ए-हुस्न उधर गई

अज़ीज़ हामिद मदनी

क्या हुए बाद-ए-बयाबाँ के पुकारे हुए लोग

अज़ीज़ हामिद मदनी

ख़त्म हुई शब-ए-वफ़ा ख़्वाब के सिलसिले गए

अज़ीज़ हामिद मदनी

हिकायत-ए-हुस्न-ए-यार लिखना हदीस-ए-मीना-ओ-जाम कहना

अज़ीज़ हामिद मदनी

हज़ार वक़्त के परतव-नज़र में होते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

इक ख़्वाब-ए-आतिशीं का वो महरम सा रह गया

अज़ीज़ हामिद मदनी

जैसे कोई रोता है गले प्यार से लग कर

अज़ीज़ एजाज़

वफ़ा के नाम पर पैरा किए कच्चे घड़े ले कर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

जिन को दीवार-ओ-दर भी ढक न सके

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

फ़साना-दर-फ़साना फिर रही है ज़िंदगी जब से

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

इक वही खोल सका सातवाँ दर मुझ पे मगर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

पड़ा है ज़िंदगी के इस सफ़र से साबिक़ा अपना

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

लिया है किस क़दर सख़्ती से अपना इम्तिहाँ हम ने

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

लहू से उठ के घटाओं के दिल बरसते हैं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

किस क़दर कम-असास हैं कुछ लोग

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

कुछ ज़िंदगी में इश्क़-ओ-वफ़ा का हुनर भी रख

अज़ीज़ अन्सारी

उतर कर पानियों में चाँद महव-ए-रक़्स रहता है

अज़हर नक़वी

शहर गुम-सुम रास्ते सुनसान घर ख़ामोश हैं

अज़हर नक़वी

रह गया दीदा-ए-पुर-आब का सामाँ हो कर

अज़हर नक़वी

कोई ऐसी बात है जिस के डर से बाहर रहते हैं

अज़हर नक़वी

गिर्या-ए-शब की शहादत के लिए जागते हैं

अज़हर नक़वी

एक इक साँस में सदियों का सफ़र काटते हैं

अज़हर नक़वी

चाक-ए-दामान-ए-क़बा दाग़-ए-जुनूँ-साज़ बहुत

अज़हर नक़वी

इस को कोई ग़म नहीं है जिस का घर पत्थर का है

अज़हर नैयर

मुझ को वहशत हुई मिरे घर से

अज़हर इक़बाल

मुझ को भी जागने की अज़िय्यत से दे नजात

अज़हर इनायती

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