दर Poetry (page 88)

न पूछ रब्त है क्या उस की दास्ताँ से मुझे

अलीम अफ़सर

करना पड़ा था जिस के लिए ये सफ़र मुझे

अलीम अफ़सर

बन के साहिल की निगाहों में तमाशा हम लोग

अलीम अफ़सर

सफ़र में राह के आशोब से न डर जाना

आलमताब तिश्ना

सफ़र में राह के आशोब से न डर जाना

आलमताब तिश्ना

दर्द की इक लहर बल खाती है यूँ दिल के क़रीब

आलमताब तिश्ना

थपक थपक के जिन्हें हम सुलाते रहते हैं

आलम ख़ुर्शीद

नए सिरे से कोई सफ़र आग़ाज़ नहीं करता

आलम ख़ुर्शीद

हमेशा दिल में रहता है कभी गोया नहीं जाता

आलम ख़ुर्शीद

हैरत के दफ़्तर जाऊँ

अकरम नक़्क़ाश

चढ़े हुए हैं जो दरिया उतर भी जाएँगे

अकरम महमूद

ज़िंदगी का वक़्फ़ा

अख़्तर-उल-ईमान

सिलसिले

अख़्तर-उल-ईमान

सब्ज़ा-ए-बेगाना

अख़्तर-उल-ईमान

मताअ-ए-राएगाँ

अख़्तर-उल-ईमान

मस्जिद

अख़्तर-उल-ईमान

बाज़-आमद --- एक मुन्ताज

अख़्तर-उल-ईमान

अपाहिज गाड़ी का आदमी

अख़्तर-उल-ईमान

आख़िरी मुलाक़ात

अख़्तर-उल-ईमान

आईना देखता हूँ

अख़्तर ज़ियाई

नए सुर की तमसील

अख़्तर उस्मान

मैं अजब आदमी हूँ

अख़्तर उस्मान

हिसार-ए-क़र्या-ए-खूँबार से निकलते हुए

अख्तर शुमार

नज़्र-ए-वतन

अख़्तर शीरानी

एक हुस्न-फ़रोश से

अख़्तर शीरानी

वो कहते हैं रंजिश की बातें भुला दें

अख़्तर शीरानी

आश्ना हो कर तग़ाफ़ुल आश्ना क्यूँ हो गए

अख़्तर शीरानी

लफ़्ज़ लिखना है तो फिर काग़ज़ की निय्यत से न डर

अख़्तर शेख़

लफ़्ज़ लिखना है तो फिर काग़ज़ की निय्यत से न डर

अख़्तर शेख़

जो ज़ेहन-ओ-दिल के ज़हरीले बहुत हैं

अख़तर शाहजहाँपुरी

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