दर Poetry (page 87)

दर-ए-शही से दर-ए-गदाई पे आ गया हूँ

अली मुज़म्मिल

होली

अली जव्वाद ज़ैदी

शिकवे हम अपनी ज़बाँ पर कभी लाए तो नहीं

अली जव्वाद ज़ैदी

हम-सफ़र गुम रास्ते ना-पैद घबराता हूँ मैं

अली जव्वाद ज़ैदी

ग़ुंडा

अली इमरान

मैं कब से मरा अपने अंदर पड़ा हूँ

अली इमरान

दिल में चलती हुई जंगों से निकल आऊँगा

अली इमरान

हिजाब आ गया था मुझ को दिल के इज़्तिराब पर

अली अकबर नातिक़

सफ़ीर-ए-लैला-4

अली अकबर नातिक़

सफ़ीर-ए-लैला-3

अली अकबर नातिक़

सफ़ीर-ए-लैला-2

अली अकबर नातिक़

सफ़ीर-ए-लैला-1

अली अकबर नातिक़

प्यासा ऊँट

अली अकबर नातिक़

नाम ओ नसब

अली अकबर नातिक़

लुहार जानता नहीं

अली अकबर नातिक़

हवा के तख़्त पर अगर तमाम उम्र तू रहा

अली अकबर नातिक़

हिज्र बना आज़ार सफ़र कैसे कटता

अली अकबर मंसूर

मैं खोए जाता हूँ तन्हाइयों की वुसअत में

अली अकबर अब्बास

ग़ुबार-ए-नूर है या कहकशाँ है या कुछ और

अली अकबर अब्बास

मुस्तहिक़ वो लज़्ज़त-ए-ग़म का नहीं

अली अहमद जलीली

वक़्त-ए-आख़िर जो बालीं पर आजाइयो

अलीम उस्मानी

तिरे चाँद जैसे रुख़ पर ये निशान-ए-दर्द क्यूँ हैं

अलीम उस्मानी

मौत आई है ज़माने की तो मर जाने दो

अलीम उस्मानी

बादा-ख़ाने की रिवायत को निभाना चाहिए

अलीम उस्मानी

नाज़िल हुआ था शहर में काला अज़ाब एक

अलीम सबा नवेदी

हर मोड़ पे सफ़र था अजब बोलने न पाए

अलीम सबा नवेदी

उठ के उस बज़्म से आ जाना कुछ आसान न था

अलीम मसरूर

भीड़ के ख़ौफ़ से फिर घर की तरफ़ लौट आया

अलीम मसरूर

इक जुनूँ कहिए उसे जो मिरे सर से निकला

अलीम मसरूर

वो क्या गए पयाम-ए-सफ़र दे गए मुझे

अलीम अख़्तर

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