दर Poetry (page 90)

यूँ बदलती है कहीं बर्क़-ओ-शरर की सूरत

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

जाम ला जाम कि आलाम से जी डरता है

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

जाँ-सिपारी के भी अरमाँ ज़िंदगी की आस भी

अख़्तर अंसारी

ज़िंदगी की तेज़ इतनी अब रवानी हो गई

अख़्तर अमान

वही है गर्दिश-ए-दौराँ वही लैल-ओ-नहार अब भी

अख़लाक़ बन्दवी

नदी का क्या है जिधर चाहे उस डगर जाए

अखिलेश तिवारी

वो हज़ार हम पे जफ़ा सही कोई शिकवा फिर भी रवा नहीं

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

जुनून-ए-इश्क़ का जो कुछ हुआ अंजाम क्या कहिए

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

न अपना नाम न चेहरा बदल के आया हूँ

अकबर मासूम

दिल दबा जाता है कितना आज ग़म के बार से

अकबर हैदराबादी

सायों से भी डर जाते हैं कैसे कैसे लोग

अकबर हैदराबादी

हाँ यही शहर मिरे ख़्वाबों का गहवारा था

अकबर हैदराबादी

दिल दबा जाता है कितना आज ग़म के बार से

अकबर हैदराबादी

हँसी में साग़र-ए-ज़र्रीं खनक खनक जाए

अकबर हमीदी

देखने को कोई तय्यार नहीं है भाई

अकबर हमीदी

ख़ुदा से माँग जो कुछ माँगना है ऐ 'अकबर'

अकबर इलाहाबादी

वो हवा न रही वो चमन न रहा वो गली न रही वो हसीं न रहे

अकबर इलाहाबादी

उन्हें निगाह है अपने जमाल ही की तरफ़

अकबर इलाहाबादी

उम्मीद टूटी हुई है मेरी जो दिल मिरा था वो मर चुका है

अकबर इलाहाबादी

जज़्बा-ए-दिल ने मिरे तासीर दिखलाई तो है

अकबर इलाहाबादी

अपनी गिरह से कुछ न मुझे आप दीजिए

अकबर इलाहाबादी

आह जो दिल से निकाली जाएगी

अकबर इलाहाबादी

ये तन घिरा हुआ छोटे से घर में रहता है

अकबर अली खान अर्शी जादह

सज़ा है किस के लिए और जज़ा है किस के लिए

अकबर अली खान अर्शी जादह

सन्नाटा तूफ़ाँ से सिवा हो ये भी तो हो सकता है

अकबर अली खान अर्शी जादह

दीवार याद आ गई दर याद आ गया

अजमल सिराज

न नज़र से कोई गुज़र सका न ही दिल से मलबा हटा सका

अजमल सिद्दीक़ी

शहर शहर ढूँड आए दर-ब-दर पुकार आए

अजमल अजमली

मौजूद हैं वो भी बालीं पर अब मौत का टलना मुश्किल है

आजिज़ मातवी

क्यूँ कहूँ कोई क़द-आवर नहीं आया अब तक

आजिज़ मातवी

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