दर Poetry (page 9)

मिला है तपता सहरा देखने को

यज़दानी जालंधरी

कोई पूछे मिरे महताब से मेरे सितारों से

यासमीन हमीद

दौलत-ए-दर्द समेटो कि बिखरने को है

यासमीन हमीद

ग़फ़लत अजब है हम को दम जिस का मारते हैं

यासीन अली ख़ाँ मरकज़

ढूँढता हक़ को दर-ब-दर है तू

यासीन अली ख़ाँ मरकज़

तेरे अल्ताफ़ का लुत्फ़ उठाते रहे

यशपाल गुप्ता

कमाल-ए-शौक़-ए-सफ़र भी उधर ही जाता है

यशब तमन्ना

ख़ुदा-रा आ के मिरी लो ख़बर कहाँ हो तुम

यासीन ज़मीर

करम नहीं तो सितम ही सही रवा रखना

यासीन क़ुदरत

रेत के इक शहर में आबाद हैं दर दर के लोग

यासीन अफ़ज़ाल

रौशनी मेरे चराग़ों की धरी रहना थी

याक़ूब यावर

मज़ाक़-ए-काविश-ए-पिन्हाँ अब इतना आम क्या होगा

याक़ूब उस्मानी

मिरे चारों तरफ़ एक आहनी दीवार क्यूँ है

याक़ूब तसव्वुर

इक ख़ला सा है जिधर देखो इधर कुछ भी नहीं

याक़ूब आमिर

रंग बदला फिर हवा का मय-कशों के दिन फिरे

यगाना चंगेज़ी

हाथ उलझा है गरेबाँ में तो घबराओ न 'यास'

यगाना चंगेज़ी

वाँ नक़ाब उट्ठी कि सुब्ह-ए-हश्र का मंज़र खुला

यगाना चंगेज़ी

सलामत रहें दिल में घर करने वाले

यगाना चंगेज़ी

ख़ुदा की मार वो अय्याम-ए-शोर-ओ-शर गुज़रे

यगाना चंगेज़ी

वाइ'ज़ के मैं ज़रूर डराने से डर गया

वज़ीर अली सबा लखनवी

इश्क़ का इख़्तिताम करते हैं

वज़ीर अली सबा लखनवी

बच कर कहाँ मैं उन की नज़र से निकल गया

वज़ीर अली सबा लखनवी

अश्क-उफ़्तादा नज़र आते हैं सारे दरिया

वज़ीर अली सबा लखनवी

बंद उस ने कर लिए थे घर के दरवाज़े अगर

वज़ीर आग़ा

सकता

वज़ीर आग़ा

निरवान

वज़ीर आग़ा

अंकबूत

वज़ीर आग़ा

इस गिर्या-ए-पैहम की अज़िय्यत से बचा दे

वज़ीर आग़ा

धूप के साथ गया साथ निभाने वाला

वज़ीर आग़ा

चलो माना हमीं बे-कारवाँ हैं

वज़ीर आग़ा

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