दर Poetry (page 7)

अहल-ए-दिल मिलते नहीं अहल-ए-नज़र मिलते नहीं

ज़हीर काश्मीरी

अब है क्या लाख बदल चश्म-ए-गुरेज़ाँ की तरह

ज़हीर काश्मीरी

क्या दुआ-ए-फ़र्सूदा हर्फ़-ए-बे-असर माँगूँ

ज़हीर ग़ाज़ीपुरी

ये सब कहने की बातें हैं हम उन को छोड़ बैठे हैं

ज़हीर देहलवी

साक़िया मर के उठेंगे तिरे मय-ख़ाने से

ज़हीर देहलवी

हरीफ़-ए-राज़ हैं ऐ बे-ख़बर दर-ओ-दीवार

ज़हीर देहलवी

हाए काफ़िर तिरे हमराह अदू आता है

ज़हीर देहलवी

फ़ित्ना-गर शोख़ी-ए-हया कब तक

ज़हीर देहलवी

शब के ग़म दिन के अज़ाबों से अलग रखता हूँ

ज़फ़र सहबाई

सब्ज़े से सब दश्त भरे हैं ताल भरे हैं पानी से

ज़फ़र सहबाई

रखा है बज़्म में उस ने चराग़ कर के मुझे

ज़फ़र सहबाई

रखा है बज़्म में उस ने चराग़ कर के मुझे

ज़फ़र सहबाई

मुज़्महिल क़दमों पे बार

ज़फ़र रबाब

मर्ग-ए-एहसास बिल-यक़ीन आख़िर

ज़फ़र रबाब

रात भर सूरज के बन कर हम-सफ़र वापस हुए

ज़फ़र मुरादाबादी

तब्-ए-रौशन को मिरी कुछ इस तरह भाई ग़ज़ल

ज़फ़र कलीम

नवा-ए-हक़ पे हूँ क़ातिल का डर अज़ीज़ नहीं

ज़फ़र कलीम

खुल गईं आँखें कि जब दुनिया का सच हम पर खुला

ज़फ़र कलीम

इन दिनों मैं ग़ुर्बतों की शाम के मंज़र में हूँ

ज़फ़र कलीम

चल पड़े तो फिर अपनी धुन में बे-ख़बर बरसों

ज़फ़र कलीम

बात मेहंदी से लहू तक आ गई

ज़फ़र कलीम

चमका जो तीरगी में उजाला बिखर गया

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

फिर सर-ए-सुब्ह किसी दर्द के दर वा करने

ज़फ़र इक़बाल

जिधर से खोल के बैठे थे दर अंधेरे का

ज़फ़र इक़बाल

यूँ भी होता है कि यक दम कोई अच्छा लग जाए

ज़फ़र इक़बाल

ये भी मुमकिन है कि आँखें हों तमाशा ही न हो

ज़फ़र इक़बाल

उठ और फिर से रवाना हो डर ज़ियादा नहीं

ज़फ़र इक़बाल

तिरे रास्तों से जभी गुज़र नहीं कर रहा

ज़फ़र इक़बाल

रुख़-ए-ज़ेबा इधर नहीं करता

ज़फ़र इक़बाल

फिर कोई शक्ल नज़र आने लगी पानी पर

ज़फ़र इक़बाल

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