दर Poetry (page 5)

फ़ाइरिंग

ज़ीशान साहिल

दोस्त

ज़ीशान साहिल

दहशत-गर्द शायर

ज़ीशान साहिल

इसी दर से इसी दीवार से आगे नहीं बढ़ता

ज़िशान मेहदी

सर उठाया मज़हबी दीवार पर पटका हुआ

ज़िशान इलाही

रात की ख़ामोशी का माथा ठंका था

ज़िशान इलाही

हम बे-घरों के दिल में जगाती है डर गली

ज़िशान इलाही

वक़्त की बर्फ़ है हर तौर पिघलने वाली

ज़ीशान साजिद

दीवार-ओ-दर थे जान सराए निकल गए

ज़ीशान साजिद

बुतान-ए-हिन्द मिरे दिल में हैं दर आए हुए

ज़ेबा

क्या मिला क़ैस को गर्द-ए-रह-ए-सहरा हो कर

ज़ेबा

'ज़ेब' मुझे डर लगने लगा है अपने ख़्वाबों से

ज़ेब ग़ौरी

सेहन-ए-चमन में जाना मेरा और फ़ज़ा में बिखर जाना

ज़ेब ग़ौरी

मुझ से ऐसे वामांदा-ए-जाँ को बिस्तर-विस्तर क्या

ज़ेब ग़ौरी

कोई भी दर न मिला नारसी के मरक़द में

ज़ेब ग़ौरी

ख़ंजर चमका रात का सीना चाक हुआ

ज़ेब ग़ौरी

हवा में उड़ता कोई ख़ंजर जाता है

ज़ेब ग़ौरी

है बहुत ताक़ वो बेदाद में डर है ये भी

ज़ेब ग़ौरी

गर्म लहू का सोना भी है सरसों की उजयाली में

ज़ेब ग़ौरी

गहरी रात है और तूफ़ान का शोर बहुत

ज़ेब ग़ौरी

दिन है बे-कैफ़ बे-गुनाहों सा

ज़ेब ग़ौरी

बुझ कर भी शो'ला दाम-ए-हवा में असीर है

ज़ेब ग़ौरी

बे-हिसी पर मिरी वो ख़ुश था कि पत्थर ही तो है

ज़ेब ग़ौरी

गुल-पोश बाम-ओ-दर हैं मगर घर में कुछ नहीं

ज़ौक़ी मुज़फ्फ़र नगरी

उस शाम को जब रूठ के में घर से चला था

ज़मीर काज़मी

पुर-हौल जंगलों की सदा मेरे साथ है

ज़मान कंजाही

नज़र में कैसा मंज़र बस गया है

ज़मान कंजाही

ख़याल-ओ-ख़्वाब में डूबी दीवार-ओ-दर बनाती हैं

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

ख़ाक सहराओं की पलकों पे सजा ली हम ने

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

हसीं यादें सुनहरे ख़्वाब पीछे छोड़ आए हैं

ज़ाकिर ख़ान ज़ाकिर

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