दर्द Poetry (page 53)

दिल-ए-ईज़ा-तलब ले तेरा कहना कर लिया मैं ने

फ़ारूक़ बाँसपारी

जली हैं दर्द की शमएँ मगर अंधेरा है

फ़ारूक़ बख़्शी

परिंदे खेत में अब तक पड़ाव डाले हैं

फ़ारूक़ अंजुम

लाख दिल ने पुकारना चाहा

फरीहा नक़वी

क्यूँ दिया था? बता! मेरी वीरानियों में सहारा मुझे

फरीहा नक़वी

बीते ख़्वाब की आदी आँखें कौन उन्हें समझाए

फरीहा नक़वी

यही है दौर-ए-ग़म-ए-आशिक़ी तो क्या होगा

फ़ारिग़ बुख़ारी

यादों का अजीब सिलसिला है

फ़ारिग़ बुख़ारी

याद आएँगे ज़माने को मिसालों के लिए

फ़ारिग़ बुख़ारी

नश्शे में जो है कोहना शराबों से ज़ियादा

फ़ारिग़ बुख़ारी

मसीह-ए-वक़्त सही हम को उस से क्या लेना

फ़ारिग़ बुख़ारी

मैं कि अब तेरी ही दीवार का इक साया हूँ

फ़ारिग़ बुख़ारी

अपने ही साए में था में शायद छुपा हुआ

फ़ारिग़ बुख़ारी

जब हर नज़र हो ख़ुद ही तजल्ली-नुमा-ए-ग़म

फ़रहत क़ादरी

आई ख़िज़ाँ चमन में गए दिन बहार के

फ़रहत क़ादरी

ये फुर्क़तों में लम्हा-ए-विसाल कैसे आ गया

फ़रहत नदीम हुमायूँ

मुँह-बोला बोल जगत का है जो मन में रहे सो अपना है

फ़रहत कानपुरी

ज़मीं ने लफ़्ज़ उगाया नहीं बहुत दिन से

फ़रहत एहसास

कुर्सी-ए-दिल पे तिरे जाते ही दर्द आ बैठे

फ़रहत एहसास

ख़ूब होनी है अब इस शहर में रुस्वाई मिरी

फ़रहत एहसास

अब दिल की तरफ़ दर्द की यलग़ार बहुत है

फ़रहत एहसास

कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से

फ़रहत अब्बास शाह

कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से

फ़रहत अब्बास शाह

गर दुआ भी कोई चीज़ है तो दुआ के हवाले किया

फ़रहत अब्बास शाह

हम से मिल कर कोई गुफ़्तुगू कीजिए

फ़रहत अब्बास

मता-ए-दर्द मआल-ए-हयात है शायद

फ़रहान सालिम

अब मुझ से सँभलती नहीं ये दर्द की सौग़ात

फ़रहान सालिम

मता-ए-दर्द मआल-ए-हयात है शायद

फ़रहान सालिम

खो बैठी है सारे ख़द-ओ-ख़ाल अपनी ये दुनिया

फ़रहान सालिम

अक्स कुछ न बदलेगा आइनों को धोने से

फ़रहान सालिम

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