दास्ताँ Poetry (page 12)

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

बशर नवाज़

नई जुस्तुजू का अलमिया

बाक़र मेहदी

दुश्मन-ए-जाँ कोई बना ही नहीं

बाक़र मेहदी

सब्र-ओ-ज़ब्त की जानाँ दास्ताँ तो मैं भी हूँ दास्ताँ तो तुम भी हो

बक़ा बलूच

अकेली

बलराज कोमल

समाअ'त के लिए इक इम्तिहाँ है

बकुल देव

बार-ए-दीगर ये फ़लसफ़े देखूँ

बकुल देव

कैफ़ियत-ए-दिल-ए-हज़ीं हम से नहीं बयाँ हुई

बीएस जैन जौहर

उन्हें मुझ से शिकायत है

अज़रा नक़वी

आँसुओं से लिख रहे हैं बेबसी की दास्ताँ

अज़्म शाकरी

तीरगी में सुब्ह की तनवीर बन जाएँगे हम

अज़्म शाकरी

जो यहाँ हाज़िर है वो मिस्ल-ए-गुमाँ मौजूद है

अज़्म बहज़ाद

क़िस्सा-ए-दर्द

अज़ीज़ तमन्नाई

अल्फ़-ए-लैला की आख़िरी सुब्ह

अज़ीज़ क़ैसी

मिरे दहन में अगर आप की ज़बाँ होती

अज़ीज़ लखनवी

लज़्ज़त-ए-ग़म

अज़ीज़ लखनवी

ताज़ा हवा बहार की दिल का मलाल ले गई

अज़ीज़ हामिद मदनी

निसार यूँ तो हुआ तुझ पे नक़्द-ए-जाँ क्या क्या

अज़ीज़ हामिद मदनी

नरमी हवा की मौज-ए-तरब-ख़ेज़ अभी से है

अज़ीज़ हामिद मदनी

जूयान-ए-ताज़ा-कारी-ए-गुफ़्तार कुछ कहो

अज़ीज़ हामिद मदनी

वफ़ा के नाम पर पैरा किए कच्चे घड़े ले कर

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

धूप मेरी सारी रंगीनी उड़ा ले जाएगी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ज़रा मुश्किल से समझेंगे हमारे तर्जुमाँ हम को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

थकन से चूर हूँ लेकिन रवाँ-दवाँ हूँ मैं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

न याद आया न भूला न सानेहा मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

लिया है किस क़दर सख़्ती से अपना इम्तिहाँ हम ने

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ख़ुद में उतरूँगी तो मैं भी लापता हो जाऊँगी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मआल-ए-दोस्ती कहिए हदीस-ए-मह-वशाँ कहिए

अज़हर सईद

बस रंज की है दास्ताँ उन्वान हज़ारों

अज़हर हाश्मी

अटूट अंग

अज़हर गौरी

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