दीवार Poetry (page 32)

जब मुंडेरों पे परिंदों की कुमक जारी थी

हम्माद नियाज़ी

हुज्रा-ए-ख़्वाब से बाहर निकला

हम्माद नियाज़ी

निगाह-ए-शौक़ क्यूँ माइल नहीं है

हामिदी काश्मीरी

चाँद कोहरे के जज़ीरों में भटकता होगा

हामिदी काश्मीरी

बस उसी का सफ़र-ए-शब में तलबगार है क्या

हामिदी काश्मीरी

प्यार ईसार वफ़ा शेर-ओ-हुनर की बातें

हमीदा शाहीन

चलो वापस चलें

हामिद यज़दानी

एक इंसान हूँ इंसाँ का परस्तार हूँ मैं

हामिद मुख़्तार हामिद

ये अब के कैसी मुश्किल हो गई है

हामिद कशमीरी

जब तिलिस्म-ए-असर से निकला था

हामिद जीलानी

हमीं हैं दर-हक़ीक़त अपने क़ारी

हामिद हुसैन हामिद

सुब्ह चले तो ज़ौक़-ए-तलब था अर्श-निशाँ ख़ुर्शीद-शिकार

हमीद नसीम

नौ-ब-नौ ये जल्वा-ज़ाई ये जमाल-ए-रंग-रंग

हमीद नसीम

बर्फ़ की वादी

हमीद अलमास

हर्फ़-ए-ग़ज़ल से रंग-ए-तमन्ना भी छीन ले

हमीद अलमास

घर है तो दर भी होगा दीवार भी रहेगी

हमीद अलमास

यक़ीन कैसे करूँगा गुमाँ में रहता हूँ

हमदम कशमीरी

काम आसाँ है मगर देखिए दुश्वार भी है

हमदम कशमीरी

है मशक़्क़त मिरी इनआ'म किसी और का है

हमदम कशमीरी

एक क़तरा न कहीं ख़ूँ का बहा मेरे बअ'द

हमदम कशमीरी

आगे जो क़दम रक्खा पीछे का न ग़म रक्खा

हलीम कुरेशी

कमरा तो ये कहता है कुछ और हवा आए

हलीम कुरेशी

देखते हैं दर-ओ-दीवार हरीफ़ाना मुझे

हकीम मंज़ूर

ढल गया जिस्म में आईने में पत्थर में कभी

हकीम मंज़ूर

बोसा लिया जो चश्म का बीमार हो गए

हैरत इलाहाबादी

पा-ब-गिल बे-ख़ुदी-ए-शौक़ से मैं रहता था

हैदर अली आतिश

मय-कदे में नश्शा की ऐनक दिखाती है मुझे

हैदर अली आतिश

ऐसी ऊँची भी तो दीवार नहीं घर की तिरे

हैदर अली आतिश

यार को मैं ने मुझे यार ने सोने न दिया

हैदर अली आतिश

वहशत-ए-दिल ने किया है वो बयाबाँ पैदा

हैदर अली आतिश

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