दीवार Poetry (page 34)

शादाँ न हो गर मुझ पे कड़ा वक़्त पड़ा है

गोपाल मित्तल

हर घड़ी बीमार हो कर रह गई

गोपाल कृष्णा शफ़क़

यूँही बुनियाद का दर्जा नहीं मिलता किसी को

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

यारों ने मेरी राह में दीवार खींच कर

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

पहले उस ने मुझे चुनवा दिया दीवार के साथ

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

किसी की राह में आने की ये भी सूरत है

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

अब मिरे गिर्द ठहरती नहीं दीवार कोई

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

आता था जिस को देख के तस्वीर का ख़याल

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

वही साहिल वही मंजधार मुझ को

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

उबल पड़ा यक-ब-यक समुंदर तो मैं ने देखा

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

पस्त-ओ-बुलंद में जो तुझे रिश्ता चाहिए

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

नायाब चीज़ कौन सी बाज़ार में नहीं

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

नहीं है बहर-ओ-बर में ऐसा मेरे यार कोई

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

कहीं कहीं से पुर-असरार हो लिया जाए

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

बढ़ा जब उस की तवज्जोह का सिलसिला कुछ और

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

बात बढ़ती गई आगे मिरी नादानी से

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

समीता-पाटिल

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

कहफ़-उल-क़हत

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

एक ज़ाती नज़्म

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

बयाबाँ दूर तक मैं ने सजाया था

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

बन में वीराँ थी नज़र शहर में दिल रोता है

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

आँख से बिछड़े काजल को तहरीर बनाने वाले

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

उन से कहा कि सिद्क़-ए-मोहब्बत मगर दरोग़

ग़ुलाम मौला क़लक़

नक़्श-बर-आब नाम है सैल-ए-फ़ना मक़ाम

ग़ुलाम मौला क़लक़

नहीं है इस नींद के नगर में अभी किसी को दिमाग़ मेरा

ग़ुलाम हुसैन साजिद

एक घर अपने लिए तय्यार करना है मुझे

ग़ुलाम हुसैन साजिद

ज़मीं के साथ फ़लक के सफ़र में हम भी हैं

ग़यास मतीन

ख़्वाब आँखों की गली छोड़ के जाने निकले

ग़यास मतीन

धूप का एहसास जाने क्यूँ उसे होता नहीं

ग़यास मतीन

न होते शाद आईन-ए-गुलिस्ताँ देखने वाले

ग़ौस मोहम्मद ग़ौसी

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