दीवार Poetry (page 51)

ख़िज़ाँ की ज़र्द सी रंगत बदल भी सकती है

अलीना इतरत

मौत आई है ज़माने की तो मर जाने दो

अलीम उस्मानी

बादा-ख़ाने की रिवायत को निभाना चाहिए

अलीम उस्मानी

नाज़िल हुआ था शहर में काला अज़ाब एक

अलीम सबा नवेदी

हर मोड़ पे सफ़र था अजब बोलने न पाए

अलीम सबा नवेदी

उठ के उस बज़्म से आ जाना कुछ आसान न था

अलीम मसरूर

इक जुनूँ कहिए उसे जो मिरे सर से निकला

अलीम मसरूर

सदाएँ जिस्म की दीवार पार करती हैं

अलीम अफ़सर

न पूछ रब्त है क्या उस की दास्ताँ से मुझे

अलीम अफ़सर

करना पड़ा था जिस के लिए ये सफ़र मुझे

अलीम अफ़सर

बन के साहिल की निगाहों में तमाशा हम लोग

अलीम अफ़सर

शिकस्त-ए-शीशा-ए-दिल की सदा हूँ

आलमताब तिश्ना

जब तक खुली नहीं थी असरार लग रही थी

आलम ख़ुर्शीद

हमेशा दिल में रहता है कभी गोया नहीं जाता

आलम ख़ुर्शीद

बस एक तिरे ख़्वाब से इंकार नहीं है

आलम ख़ुर्शीद

ज़िंदगी का वक़्फ़ा

अख़्तर-उल-ईमान

सब्ज़ा-ए-बेगाना

अख़्तर-उल-ईमान

मस्जिद

अख़्तर-उल-ईमान

हिसार-ए-क़र्या-ए-खूँबार से निकलते हुए

अख्तर शुमार

लफ़्ज़ लिखना है तो फिर काग़ज़ की निय्यत से न डर

अख़्तर शेख़

इक उम्र भटकते रहे घर ही नहीं आया

अख़तर शाहजहाँपुरी

अगर बुलंदी का मेरी वो ए'तिराफ़ करे

अख़तर शाहजहाँपुरी

एक कहानी

अख़्तर रज़ा सलीमी

सन्नाटा

अख़्तर राही

जो भी मिल जाता है घर-बार को दे देता हूँ

अख़्तर नज़्मी

जो संग हो के मुलाएम है सादगी की तरह

अख़तर इमाम रिज़वी

तपिश गुलज़ार तक पहुँची लहू दीवार तक आया

अख़्तर हुसैन जाफ़री

तपिश गुलज़ार तक पहुँची लहू दीवार तक आया

अख़्तर हुसैन जाफ़री

वो जो दीवार-ए-आश्नाई थी

अख़्तर होशियारपुरी

शायान-ए-ज़िंदगी न थे हम मो'तबर न थे

अख़्तर होशियारपुरी

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