देख Poetry (page 35)

लफ़्ज़ों को सजा कर जो कहानी लिखना

सदफ़ जाफ़री

आग थी ऐसी कि अरमाँ जल गए

सदफ़ जाफ़री

लोग कहते हैं दिल लगाना जिसे

सदा अम्बालवी

लाख तक़दीर पे रोए कोई रोने वाला

सदा अम्बालवी

दिल न माना मना के देख लिया

सदा अम्बालवी

अब कहाँ दोस्त मिलें साथ निभाने वाले

सदा अम्बालवी

आँधी का कर ख़याल न तेवर हवा के देख

साबिर ज़ाहिद

मैं जिस के साथ 'ज़फ़र' उम्र भर उठा बैठा

साबिर ज़फ़र

किसी तौर हो न पिन्हाँ तिरा रंग-ए-रू-सियाही

साबिर ज़फ़र

ख़िज़ाँ से सीना भरा हो लेकिन तुम अपना चेहरा गुलाब रखना

साबिर वसीम

ये कैसी सियासत है मिरे मुल्क पे हावी

साबिर दत्त

रुख़ उन का कहीं और नज़र और तरफ़ है

साबिर दत्त

फिर लाई है बरसात तिरी याद का मौसम

साबिर दत्त

जी भर के तुम्हें देख लूँ तस्कीन हो कुछ तो

साबिर दत्त

ख़्वाबों से न जाओ कि अभी रात बहुत है

साबिर दत्त

हैरान हूँ दो आँखों से क्या देख रहा हूँ

साबिर दत्त

चाँदनी रात में शानों से ढलकती चादर

साबिर दत्त

मैं अकेला हूँ तू भी तन्हा है

साबिर अदीब

मुझ से पहले मिरे वतीरे देख

साबिर अदीब

ये सैल-ए-अश्क मुझे गुफ़्तुगू की ताब तो दे

सबिहा सबा, न्यूयार्क

शाख़ों पर जब पत्ते हिलने लगते हैं

सबा नुसरत

बू-ए-ख़ुश की तरह हर सम्त बिखर जाऊँगा

सबा जायसी

सौ बार जिस को देख के हैरान हो चुके

सबा अकबराबादी

इस शान का आशुफ़्ता-ओ-हैराँ न मिलेगा

सबा अकबराबादी

उस को भी हम से मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं

सबा अकबराबादी

पूछें तिरे ज़ुल्म का सबब हम

सबा अकबराबादी

लुटा के राह-ए-मोहब्बत में हर ख़ुशी मैं ने

सबा अफ़ग़ानी

सुना भी कभी माजरा दर्द-ओ-ग़म का किसी दिल-जले की ज़बानी कहो तो

साइल देहलवी

हक़-ओ-नाहक़ जलाना हो किसी को तो जला देना

साइल देहलवी

हमें कहती है दुनिया ज़ख़्म-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर वाले

साइल देहलवी

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