धुआं Poetry (page 13)

वफ़ाएँ कर के जफ़ाओं का ग़म उठाए जा

एहसान दानिश

कल रात कुछ अजीब समाँ ग़म-कदे में था

एहसान दानिश

ऐ इंक़लाब-ए-नौ के उजाले कहाँ है तू

दिलकश सागरी

बदन को छोड़ ही जाना है रूह ने 'आज़र'

दिलावर अली आज़र

दरून-ए-ख़्वाब नया इक जहाँ निकलता है

दिलावर अली आज़र

राज़-ए-निहाँ थी ज़िंदगी राज़-ए-निहाँ है आज भी

दर्शन सिंह

तसलसुल से गुमाँ लिक्खा गया है

दानियाल तरीर

शीशे से ज़ियादा नाज़ुक था ये शीशा-ए-दिल जो टूट गया

दानिश फ़राही

समंदर का सुकूत

चन्द्रभान ख़याल

मिरी हथेली में लिक्खा हुआ दिखाई दे

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

हब्स के दिनों में भी घर से कब निकलते हैं

बशीर सैफ़ी

सर पे इक साएबाँ तो रहने दे

बशीर मुंज़िर

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

बशर नवाज़

अबदियत

बशर नवाज़

लाख पर्दे से रुख़-ए-अनवर अयाँ हो जाएगा

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

ख़बर कुछ ऐसी उड़ाई किसी ने गाँव में

बाक़ी सिद्दीक़ी

दामन-ए-सब्र के हर तार से उठता है धुआँ

बाक़र मेहदी

जो ज़माने का हम-ज़बाँ न रहा

बाक़र मेहदी

दर्द-ए-दिल आज भी है जोश-ए-वफ़ा आज भी है

बाक़र मेहदी

बदल के रख देंगे ये तसव्वुर कि आदमी का वक़ार क्या है

बाक़र मेहदी

हवस शामिल है थोड़ी सी दुआ में

बकुल देव

समाअ'त के लिए इक इम्तिहाँ है

बकुल देव

कहीं सुब्ह-ओ-शाम के दरमियाँ कहीं माह-ओ-साल के दरमियाँ

बद्र-ए-आलम ख़लिश

नवेद-ए-सफ़र

बद्र वास्ती

जो झुक के मिलते थे जलसों में मेहरबाँ की तरह

बदनाम नज़र

खड़ा था कौन कहाँ कुछ पता चला ही नहीं

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

उठो 'अज़्म' इस आतिश-ए-शौक़ को सर्द होने से रोको

अज़्म बहज़ाद

मुझे कल अचानक ख़याल आ गया आसमाँ खो न जाए

अज़्म बहज़ाद

ख़याल-ओ-ख़्वाब का सारा धुआँ उतर चुका है

अज़ीज़ नबील

ये ग़लत है ऐ दिल-ए-बद-गुमाँ कि वहाँ किसी का गुज़र नहीं

अज़ीज़ लखनवी

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