दिल Poetry (page 55)

इन ज़ालिमों को जौर सिवा काम ही नहीं

ताबाँ अब्दुल हई

हुए हैं जा के आशिक़ अब तो हम उस शोख़ चंचल के

ताबाँ अब्दुल हई

है आरज़ू ये जी में उस की गली में जावें

ताबाँ अब्दुल हई

दिलबर से दर्द-ए-दिल न कहूँ हाए कब तलक

ताबाँ अब्दुल हई

दाग़-ए-दिल अपना जब दिखाता हूँ

ताबाँ अब्दुल हई

अज़ीज़ाँ सितमगर न आया मिरे घर

ताबाँ अब्दुल हई

ऐश सब ख़ुश आते हैं जब तलक जवानी है

ताबाँ अब्दुल हई

आरज़ू है मैं रखूँ तेरे क़दम पर गर जबीं

ताबाँ अब्दुल हई

आई बहार शोरिश-तिफ़लाँ को क्या हुआ

ताबाँ अब्दुल हई

कोई भी नक़्श सलामत नहीं है चेहरे का

ताब असलम

वहशत-ए-दिल ये बढ़ी छोड़ दिए घर सब ने

तअशशुक़ लखनवी

शोला-ए-हुस्न से था दूद-ए-दिल अपना अव्वल

तअशशुक़ लखनवी

क़ाफ़िले रात को आते थे उधर जान के आग

तअशशुक़ लखनवी

मुंतज़िर तेरे हैं चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ खोले हुए

तअशशुक़ लखनवी

मुझ से क्या पूछते हो दाग़ हैं दिल में कितने

तअशशुक़ लखनवी

जलूँगा मैं कि दिल उस बुत का ग़ैर पर आया

तअशशुक़ लखनवी

देते फिरते थे हसीनों की गली में आवाज़

तअशशुक़ लखनवी

चला घर से वो बहर-ए-हुस्न अल्लाह रे कशिश दिल की

तअशशुक़ लखनवी

बार-ए-ख़ातिर ही अगर है तो इनायत कीजे

तअशशुक़ लखनवी

बहुत मुज़िर दिल-ए-आशिक़ को आह होती है

तअशशुक़ लखनवी

याद-ए-अय्याम कि हम-रुतबा-ए-रिज़वाँ हम थे

तअशशुक़ लखनवी

उन्स है ख़ाना-ए-सय्याद से गुलशन कैसा

तअशशुक़ लखनवी

ता-सहर की है फ़ुग़ाँ जान के ग़ाफ़िल मुझ को

तअशशुक़ लखनवी

सू-ए-दयार ख़ंदा-ज़न वो यार-ए-जानी फिर गया

तअशशुक़ लखनवी

न डरे बर्क़ से दिल की है कड़ी मेरी आँख

तअशशुक़ लखनवी

मुँह जो फ़ुर्क़त में ज़र्द रहता है

तअशशुक़ लखनवी

महफ़िल से उठाने के सज़ा-वार हमीं थे

तअशशुक़ लखनवी

कब अपनी ख़ुशी से वो आए हुए हैं

तअशशुक़ लखनवी

जोश पर थीं सिफ़त-ए-अब्र-ए-बहारी आँखें

तअशशुक़ लखनवी

दो दमों से है फ़क़त गोर-ए-ग़रीबाँ आबाद

तअशशुक़ लखनवी

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