दोस्ती Poetry (page 2)

मुसाफ़िरों के लिए साज़गार थोड़ी है

विकास शर्मा राज़

निफ़ाक़

उरूज क़ादरी

शब-ए-तारीक हूँ नूर-ए-सहर होने की ख़्वाहिश है

तौक़ीर रज़ा

रुख़ से नक़ाब उन के जो हटती चली गई

तौक़ीर अहमद

न जाने आग कैसी आइनों में सो रही थी

तौक़ीर अब्बास

अश्क टपकें लाख होंटों की हँसी जाती नहीं

तरुणा मिश्रा

हवा में आए तो लौ भी न साथ ली हम ने

तारिक़ नईम

निरवान

ताऊस

तिरी चाल धुन तिरी साँस सुर मिरे दिल को आ के सँभाल भी

तनवीर मोनिस

रात के पड़ाव पर

तनवीर अंजुम

ज़िंदगी क्या हर क़दम पर इक नई दीवार है

सय्यद मेराज जामी

ज़माने में मोहब्बत की अगर बारिश नहीं होती

सय्यद आरिफ़ अली

गले हम क्या मिलें उस आदमी से

सय्यद आरिफ़ अली

मुनव्वर और मुबहम इस्तिआरे देख लेता हूँ

सय्यद अमीन अशरफ़

आई सहर क़रीब तो मैं ने पढ़ी ग़ज़ल

सय्यद आबिद अली आबिद

उल्टे सीधे गिरे पड़े हैं पेड़

सूर्यभानु गुप्त

अभी तक साँस लम्हे बुन रही है

सुलतान सुबहानी

जाने क्यूँ बातों से जलते हैं गिले करते हैं लोग

सुलतान रशक

ये सिखाया है दोस्ती ने हमें

सुदर्शन फ़ाकिर

हम से पूछो न दोस्ती का सिला

सुदर्शन फ़ाकिर

मेरे दुख की कोई दवा न करो

सुदर्शन फ़ाकिर

बढ़ा जो दर्द-ए-जिगर ग़म से दोस्ती कर ली

सुभाष पाठक ज़िया

आलम के दोस्तों में मुरव्वत नहीं रही

सिराज औरंगाबादी

न कोई नक़्श न पैकर सराब चारों तरफ़

सिद्दीक़ मुजीबी

लहू में डूब के तलवार मेरे घर पहुँची

सिब्त अली सबा

तेरे मिलने से हम को ख़ुशी मिल गई

श्याम सुन्दर नंदा नूर

उस के आने पे भी नहीं आई

शुजा ख़ावर

सहरा में कड़ी धूप का डर होते हुए भी

शोज़ेब काशिर

बस अपनी ख़ाक पर अब ख़ुद ही सुल्तानी करेंगे हम

शोएब निज़ाम

न रहबर ने न उस की रहबरी ने

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

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