शोक Poetry (page 62)

विदा-ए-यार का लम्हा ठहर गया मुझ में

रहमान फ़ारिस

उम्र-भर इश्क़ किसी तौर न कम हो आमीन

रहमान फ़ारिस

सर-ब-सर यार की मर्ज़ी पे फ़िदा हो जाना

रहमान फ़ारिस

सदाएँ देते हुए और ख़ाक उड़ाते हुए

रहमान फ़ारिस

सदाएँ देते हुए और ख़ाक उड़ाते हुए

रहमान फ़ारिस

रात आ बैठी है पहलू में सितारो तख़लिया

रहमान फ़ारिस

नज़र उठाएँ तो क्या क्या फ़साना बनता है

रहमान फ़ारिस

मुझे ग़रज़ है सितारे न माहताब के साथ

रहमान फ़ारिस

ताज़ियत की खोखली है रस्म जारी आज-कल

रेहान अल्वी

यूँ खुले बंदों मोहब्बत का न चर्चा करना

रज़्ज़ाक़ अफ़सर

ख़्वाब-फ़रोश

रज़ी रज़ीउद्दीन

कोह-ए-ग़म इतना गराँ इतना गराँ है अब के

रज़ी रज़ीउद्दीन

दर्द-ओ-ग़म सब सुनाने बैठे हैं

रज़ी रज़ीउद्दीन

हम इतने परेशाँ थे कि हाल-ए-दिल-ए-सोज़ाँ

राज़ी अख्तर शौक़

था मिरी जस्त पे दरिया बड़ी हैरानी में

राज़ी अख्तर शौक़

कुछ लोग समझने ही को तयार नहीं थे

राज़ी अख्तर शौक़

जिस पल मैं ने घर की इमारत ख़्वाब-आसार बनाई थी

राज़ी अख्तर शौक़

बिछड़ते वक़्त तो कुछ उस में ग़म-गुसारी थी

राज़ी अख्तर शौक़

मेहमान-ए-ख़ोसूसी

रज़ा नक़वी वाही

ज़िंदगी अब इस क़दर सफ़्फ़ाक हो जाएगी क्या

रज़ा मौरान्वी

उन की निगाह-ए-नाज़ के क़ाबिल कहें जिसे

रज़ा जौनपुरी

फिर राह दिखा मुझ को ऐ मशरब-ए-रिंदाना

रज़ा जौनपुरी

मकीं और भी हैं मकाँ और भी हैं

रज़ा जौनपुरी

क्या पूछते हो मुझ को मोहब्बत में क्या मिला

रज़ा जौनपुरी

कैफ़ नसीब अब कहाँ ग़ुंचों के भी जमाल में

रज़ा जौनपुरी

मा'मूरा-ए-अफ़्क़ार में इक हश्र बपा है

रज़ा हमदानी

है ग़नीमत ये फ़रेब-ए-शब-ए-व'अदा ऐ दिल

रज़ा हमदानी

अश्क यूँ बहते हैं सावन की झड़ी हो जैसे

रज़ा हमदानी

यारब तू उस के दिल से सदा रखियो ग़म को दूर

रज़ा अज़ीमाबादी

यार के रुख़ ने कभी इतना न हैराँ किया

रज़ा अज़ीमाबादी

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