शोक Poetry (page 63)

उस चश्म ने कि तूतियों को नुक्ता-दाँ किया

रज़ा अज़ीमाबादी

गुल-ए-उश्शाक़ रंग-ए-बाख़्ता है

रज़ा अज़ीमाबादी

भर नज़र देखेंगे हम उस को मिला जानाँ अगर

रज़ा अज़ीमाबादी

अब्र के बिन देखे हरगिज़ ख़ुश दिल-ए-मस्ताँ न हो

रज़ा अज़ीमाबादी

अब तो तुम भी जवाँ हुए हो देखेंगे दिल को बचाओगे तुम

रज़ा अज़ीमाबादी

दामन से अपने झाड़ के सहरा-ए-ग़म की धूल

रज़ा अश्क

दिल बता और क्या है होने को

रज़ा अमरोही

ज़िंदगी जब से शनासा-ए-मुहालात हुई

रविश सिद्दीक़ी

तुझ पे खुल जाए कि क्या मेहर को शबनम से मिला

रविश सिद्दीक़ी

सुकूँ है हमनवा-ए-इज़्तिराब आहिस्ता आहिस्ता

रविश सिद्दीक़ी

सवाल-ए-इश्क़ पर ता-हश्र चुप रहना पड़ा मुझ को

रविश सिद्दीक़ी

रंग पर जब वो बज़्म-ए-नाज़ आई

रविश सिद्दीक़ी

पास-ए-वहशत है तो याद-ए-रुख़-ए-लैला भी न कर

रविश सिद्दीक़ी

लगी है भीड़ बड़ा मय-कदे का नाम भी है

रविश सिद्दीक़ी

क्या सितम कर गई ऐ दोस्त तिरी चश्म-ए-करम

रविश सिद्दीक़ी

ख़्वाब-ए-दीदार न देखा हम ने

रविश सिद्दीक़ी

कौन कहता मुझे शाइस्ता-ए-तहज़ीब-ए-जुनूँ

रविश सिद्दीक़ी

कहीं फ़साना-ए-ग़म है कहीं ख़ुशी की पुकार

रविश सिद्दीक़ी

हम मय-कशों के क़दमों पर अक्सर

रविश सिद्दीक़ी

दौर-ए-सबूही शोला-ए-मीना रक़्साँ छाँव में तारों की

रविश सिद्दीक़ी

बादा-ए-गुल को सब अंदोह-रुबा कहते हैं

रविश सिद्दीक़ी

उन से मिलना किसी बहाने से

रौनक़ टोंकवी

न बातें कीं न तस्कीं दी न पहलू में ज़रा ठहरे

रौनक़ टोंकवी

ज़िंदगी के कैसे कैसे हौसले पथरा गए

रौनक़ रज़ा

शाम-ए-ग़म की है अता सुब्ह-ए-मसर्रत दी है

रौनक़ रज़ा

रात की सारी हक़ीक़त दिन में उर्यां हो गई

रौनक़ रज़ा

न जाने कौन सा मंज़र नज़र से गुज़रा था

रौनक़ रज़ा

भूली-बिसरी ख़्वाहिशों का बोझ आँखों पर न रख

रौनक़ रज़ा

दरवाज़ा मायूस है शायद सोग में है अँगनाई बहुत

रौनक़ नईम

चाक दामन भी हुआ चाक-ए-गरेबाँ की तरह

रऊफ़ यासीन जलाली

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