शोक Poetry (page 85)

है नौ-जवानी में ज़ोफ़-ए-पीरी बदन में रअशा कमर में ख़म है

हबीब मूसवी

दाग़-ए-दिल हैं ग़ैरत-ए-सद-लाला-ज़ार अब के बरस

हबीब मूसवी

बना के आईना-ए-तसव्वुर जहाँ दिल-ए-दाग़-दार देखा

हबीब मूसवी

पहलू में इक नई सी ख़लिश पा रहा हूँ मैं

हबीब अशअर देहलवी

वो भला कैसे बताए कि ग़म-ए-हिज्र है क्या

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

इज़हार-ए-ग़म किया था ब-उम्मीद-ए-इल्तिफ़ात

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

अब तो जो शय है मिरी नज़रों में है ना-पाएदार

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

ये ग़म नहीं है कि अब आह-ए-ना-रसा भी नहीं

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

नवेद-ए-आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहार भी तो नहीं

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

और ऐ चश्म-ए-तरब बादा-ए-गुलफ़ाम अभी

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

दश्त-ए-ग़म में साया-ए-गेसू न ढूँढ

हबाब तिर्मिज़ी

आज उन्हें देख लिया बज़्म में फ़र्ज़ानों की

हबाब तिर्मिज़ी

ऐ ग़म-ए-हिज्र रात कितनी है

ग्यान चन्द मंसूर

तिरी तलब ने फ़लक पे सब के सफ़र का अंजाम लिख दिया है

गुलज़ार बुख़ारी

ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा

गुलज़ार

दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म

गुलज़ार

मुझे अँधेरे में बे-शक बिठा दिया होता

गुलज़ार

हर एक ग़म निचोड़ के हर इक बरस जिए

गुलज़ार

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई

गुलज़ार

न कोई दीन होता है न कोई ज़ात होती है

गुलशन बरेलवी

याद करने का तुम्हें कोई इरादा भी न था

गुलनार आफ़रीन

शजर-ए-उम्मीद भी जल गया वो वफ़ा की शाख़ भी जल गई

गुलनार आफ़रीन

न साथ देगा कोई राह आश्ना मेरा

गुलनार आफ़रीन

न पूछ ऐ मिरे ग़म-ख़्वार क्या तमन्ना थी

गुलनार आफ़रीन

हमारा नाम पुकारे हमारे घर आए

गुलनार आफ़रीन

दिल ने इक आह भरी आँख में आँसू आए

गुलनार आफ़रीन

महज़ूँ न हो 'हुज़ूर' अब आता है यार अपना

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

कितने दरिया इस नगर से बह गए

गुलाम जीलानी असग़र

अब के बाज़ार में ये तुर्फ़ा तमाशा देखा

गुलाम जीलानी असग़र

वक़ार दे के कभी बे-वक़ार मत करना

गुहर खैराबादी

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