घड़ी Poetry (page 13)

दो घड़ी साए में जलने की अज़िय्यत और है

एज़ाज़ अफ़ज़ल

बज़्म-ए-तन्हाई में अक्स-ए-शो'ला-पैकर था कोई

एहतराम इस्लाम

रह गया ख़्वाब-ए-दिल-आराम अधूरा किस का

दिल अय्यूबी

ख़िर्क़ा-पोशी में ख़ुद-नुमाई है

दाऊद औरंगाबादी

टुक ख़बर ले कि हर घड़ी हम को

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे

दाग़ देहलवी

निगाह-ए-शोख़ जब उस से लड़ी है

दाग़ देहलवी

मोहब्बत में आराम सब चाहते हैं

दाग़ देहलवी

उन्हें ढूँडो

बुशरा एजाज़

मिरी रात मेरा चराग़ मेरी किताब दे

बुशरा एजाज़

ख़िज़ाँ जब तक चली जाती नहीं है

बिस्मिल अज़ीमाबादी

जब कभी नाम-ए-मोहम्मद लब पे मेरे आए है

बिस्मिल अज़ीमाबादी

करूँ क्या सख़्त मुश्किल आ पड़ी है

बिल्क़ीस ख़ान

फिर मुझे लिखना जो वस्फ़-ए-रू-ए-जानाँ हो गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र

हर घड़ी तेरा तसव्वुर हर नफ़स तेरा ख़याल

भारत भूषण पन्त

मुस्तक़िल रोने से दिल की बे-कली बढ़ जाएगी

भारत भूषण पन्त

न सही आप हमारे जो मुक़द्दर में नहीं

बेख़ुद देहलवी

न तो अपने घर में क़रार है न तिरी गली में क़याम है

बेदम शाह वारसी

वो दरिया-बार अश्कों की झड़ी है

बयान मेरठी

खुला है जल्वा-ए-पिन्हाँ से अज़-बस चाक वहशत का

बयान मेरठी

पूछते हैं वो इश्क़ का मतलब

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

हम हथेली पे जान रखते हैं

बशीर महताब

हम बयाबानों में घूमे शहर की सड़कों पे टहले

बशीर मुंज़िर

पता नहीं वो कौन था

बशर नवाज़

उन का या अपना तमाशा देखो

बाक़ी सिद्दीक़ी

सर्द, तारीक रात

बलराज कोमल

मैं, एक और मैं

बलराज कोमल

चुटकियाँ लेती है गोयाई किसे आवाज़ दूँ

बलराज हयात

आग ही काश लग गई होती

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

मो'तबर से रिश्तों का साएबान रहने दो

अज़रा नक़वी

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