गुल Poetry (page 31)

क्या मेरा इख़्तियार ज़मान-ओ-मकान पर

सलीम शाहिद

खुलती है गुफ़्तुगू से गिरह पेच-ओ-ताब की

सलीम शाहिद

हूँ मैं भी वही मेरा मुक़ाबिल भी वही है

सलीम शाहिद

बे-वज़्अ शब-ओ-रोज़ की तस्वीर दिखा कर

सलीम शाहिद

तिरी निगाह की जब से मुआ'विनत न रही

सलीम सरफ़राज़

रंग-ए-ख़ुलूस गंग-ओ-जमन में नहीं रहा

सलीम सरफ़राज़

अच्छा था कोई ख़्वाब नज़र में न पालते

सलीम सरफ़राज़

कुछ भी था सच के तरफ़-दार हुआ करते थे

सलीम कौसर

अभी जो गर्दिश-ए-अय्याम से मिला हूँ मैं

सलीम कौसर

तिरी तलाश में गुज़रे कई ज़माने मुझे

सलीम काशीर

चमकती ओस की सूरत गुलों की आरज़ू होना

सलीम फ़िगार

ये ख़याल अब तो दिल-आज़ार हमारे लिए है

सलीम फ़राज़

वो तीरगी-ए-शब है कि घर लौट गए हैं

सलीम फ़राज़

तिरी निगाह की जब से मुआवनत न रही

सलीम फ़राज़

कम रंज मौसम-ए-गुल-ए-तर ने नहीं दिया

सलीम फ़राज़

हर-चंद मिरा शौक़-ए-सफ़र यूँ न रहेगा

सलीम फ़राज़

फ़स्ल-ए-जुनूँ में दामन-ओ-दिल चाक भी नहीं

सलीम फ़राज़

अच्छा था कोई ख़्वाब नज़र में न पालते

सलीम फ़राज़

फूलों की है तख़्लीक़ कि शो'लों से बना है

सलीम बेताब

वो मिरे दिल की रौशनी वो मिरे दाग़ ले गई

सलीम अहमद

नया मज़मूँ किताब-ए-ज़ीस्त का हूँ

सलीम अहमद

मंज़िल-ए-बे-जहत की ख़ैर सई-ए-सफ़र है राएगाँ

सलीम अहमद

कल नशात-ए-क़ुर्ब से मौसम बहार-अंदाज़ा था

सलीम अहमद

जो बात दिल में थी वो कब ज़बान पर आई

सलीम अहमद

जो आँखों के तक़ाज़े हैं वो नज़्ज़ारे बनाता हूँ

सलीम अहमद

जिस का इंकार भी इंकार न समझा जाए

सलीम अहमद

इश्क़ में जिस के ये अहवाल बना रक्खा है

सलीम अहमद

इश्क़ और इतना मोहज़्ज़ब छोड़ कर दीवाना-पन

सलीम अहमद

देखने के लिए इक शर्त है मंज़र होना

सलीम अहमद

क्या इसी को बहार कहते हैं

सलाम संदेलवी

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