गुल Poetry (page 33)

कभी कभी

सज्जाद ज़हीर

ज़ख़्म खुले पड़ते हैं दिल के मौसम है ये बहारों का

सज्जाद बाक़र रिज़वी

ज़बाँ को ज़ाइका-ए-शेर-ए-तर नहीं मिलता

सज्जाद बाक़र रिज़वी

वो घिर के आया घटाओं की तीरगी की तरह

सज्जाद बाक़र रिज़वी

पूछो मुझे ऐ हम-नफ़साँ कौन हूँ क्या हूँ

सज्जाद बाक़र रिज़वी

नवाह-ए-शौक़ में है इक दयार-ए-निकहत-ए-गुल

सज्जाद बाक़र रिज़वी

मैं हम-नफ़साँ जिस्म हूँ वो जाँ की तरह था

सज्जाद बाक़र रिज़वी

लफ़्ज़ जब कोई न हाथ आया मआनी के लिए

सज्जाद बाक़र रिज़वी

क्या इश्क़ का लें नाम हवस आम नहीं है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हज़ार शुक्र कभी तेरा आसरा न गया

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हमें चार सम्त की दौड़ में वही गर्द-ए-बाद-ए-सदा मिला

सज्जाद बाक़र रिज़वी

दिल ख़ूँ हुआ है शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना के साथ

सज्जाद बाक़र रिज़वी

अँधेरे दिन की सफ़ारत को आए हैं अब के

सज्जाद बाक़र रिज़वी

अक्सर बैठे तन्हाई की ज़ुल्फ़ें हम सुलझाते हैं

सज्जाद बाक़र रिज़वी

अहद-ए-वफ़ा सुबुक-हवा रंग-ए-वफ़ा के साथ साथ

सज्जाद बाक़र रिज़वी

चहचहाती चंद चिड़ियों का बसर था पेड़ पर

सज्जाद बलूच

कब से महव-ए-सफ़र हो

साजिदा ज़ैदी

तारे सारे रक़्स करेंगे चाँद ज़मीं पर उतरेगा

साजिद हाश्मी

कोई इम्काँ तो न था उस का मगर चाहता था

साइमा असमा

ज़ख़्मों को मिरे रंग हिना दे गई सबा

सैलानी सेवते

वो भी हमें सरगिराँ मिले हैं

सैफ़ुद्दीन सैफ़

फूल इस ख़ाक-दाँ के हम भी हैं

सैफ़ुद्दीन सैफ़

कुछ तो रंगीनी-ए-अफ़कार खुले

सैफ़ुद्दीन सैफ़

कोई नहीं आता समझाने

सैफ़ुद्दीन सैफ़

बड़े ख़तरे में है हुस्न-ए-गुलिस्ताँ हम न कहते थे

सैफ़ुद्दीन सैफ़

ओढ़ी रिदा-ए-दर्द भी हालात की तरह

सैफ़ ज़ुल्फ़ी

नया सफ़र है पुराने चराग़ गुल कर दो

साहिर लुधियानवी

मुझे सोचने दे

साहिर लुधियानवी

मुफ़ाहमत

साहिर लुधियानवी

आवाज़-ए-आदम

साहिर लुधियानवी

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