गुल Poetry (page 32)

कटेगी कैसे गुल-ए-नौ की ज़िंदगी या-रब

सलाम संदेलवी

तरब-आफ़रीं है कितना सर-ए-शाम ये नज़ारा

सलाम संदेलवी

ताबानी-ए-रुख़ ले कर तुम सामने जब आए

सलाम संदेलवी

बू-ए-गुल बाद-ए-सबा लाई बहुत देर के बा'द

सलाम संदेलवी

ये धरती ख़ूब-सूरत है

सलाम मछली शहरी

मजबूरियाँ

सलाम मछली शहरी

ड्राइंग-रूम

सलाम मछली शहरी

अवाम

सलाम मछली शहरी

आग

सलाम मछली शहरी

न मौज-ए-बादा न ज़ुल्फ़ों न इन घटाओं ने

सलाम मछली शहरी

कभी कभी अर्ज़-ए-ग़म की ख़ातिर हम इक बहाना भी चाहते हैं

सलाम मछली शहरी

इन ग़ज़ालान-ए-तरह-दार को कैसे छोड़ूँ

सलाम मछली शहरी

ग़म पर हैं तअ'ना-ज़न तो ख़ुशी भी निभाइए

सलाम मछली शहरी

मिरी रात खो गई है किसी जागते बदन में

सलाहुद्दीन परवेज़

रंगत उस रुख़ की गुल ने पाई है

सख़ी लख़नवी

जाएगी गुलशन तलक उस गुल की आमद की ख़बर

सख़ी लख़नवी

बर्ग-ए-गुल आ मैं तेरे बोसे लूँ

सख़ी लख़नवी

उन की चुटकी में दिल न मल जाता

सख़ी लख़नवी

क़ासिद तिरे बार बार आए

सख़ी लख़नवी

क़ब्र में अब किसी का ध्यान नहीं

सख़ी लख़नवी

निस्बत वही माह-ए-आसमाँ से

सख़ी लख़नवी

ना-ख़ुश जो हो गुल-बदन किसी का

सख़ी लख़नवी

मुंकिर-ए-बुत है ये जाहिल तो नहीं

सख़ी लख़नवी

माह-ए-नौ पर्दा-ए-सहाब में है

सख़ी लख़नवी

जी जाए मगर न वो परी जाए

सख़ी लख़नवी

हम पे जौर-ओ-सितम के क्या मअनी

सख़ी लख़नवी

है चमन में रहम गुलचीं को न कुछ सय्याद को

सख़ी लख़नवी

दिल उसे दे दिया 'सख़ी' ही तो है

सख़ी लख़नवी

दिल ही मेरा फ़क़त है मतलब का

सख़ी लख़नवी

बहार आ कर जो गुलशन में वो गाएँ

सख़ी लख़नवी

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