गुल Poetry (page 30)

जब शाम हुई मैं ने क़दम घर से निकाला

सरवत हुसैन

हवा ओ अब्र को आसूदा-ए-मफ़्हूम कर देखूँ

सरवत हुसैन

माडर्न हीरें तो ज़र-दारों के हाँ रह जाएँगी

सरफ़राज़ शाहिद

उन को देखा तो तबीअ'त में रवानी आई

सरदार सोज़

मैं फ़र्त-ए-मसर्रत से डर है कि न मर जाऊँ

सरदार सोज़

अफ़्सोस क्या जो हम भी तुम्हारे नहीं रहे

सरदार सोज़

उन बुतों से रब्त तोड़ा चाहिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

तुम्हें शब-ए-व'अदा दर्द-ए-सर था ये सब हैं बे-ए'तिबार बातें

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

मिरा ये ज़ख़्म सीने का कहीं भरता है सीने से

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

काली घटा कब आएगी फ़स्ल-ए-बहार में

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

बोसा देते हो अगर तुम मुझ को दो दो सब के दो

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ब-जुज़ साया तन-ए-लाग़र को मेरे कोई क्या समझे

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

बू-ए-गुल फूलों में रहती थी मगर रह न सकी

साक़िब लखनवी

मैं नहीं कहता कि दुनिया को बदल कर राह चल

साक़िब लखनवी

इबरत-ए-दहर हो गया जब से छुपा मज़ार में

साक़िब लखनवी

हज़ार फूल लिए मौसम-ए-बहार आए

साक़िब लखनवी

मिट्टी थी ख़फ़ा मौज उठा ले गई हम को

साक़ी फ़ारुक़ी

जो तेरे दिल में है वो बात मेरे ध्यान में है

साक़ी फ़ारुक़ी

चश्म-ए-तर है कोई सराब नहीं

संदीप कोल नादिम

कब इस से क़ब्ल नज़र में गुल-ए-मलाल खिला

समीना राजा

रौशनी तक रौशनी का रास्ता कह लीजिए

समद अंसारी

हम रूह-ए-काएनात हैं नक़्श-ए-असास हैं

समद अंसारी

बुझते सूरज के शरारे नूर बरसाने लगे

समद अंसारी

दिल को उजड़े हुए बीते हैं ज़माने कितने

सलमान अंसारी

हम जो पहले कहीं मिले होते

सलमान अख़्तर

यक़ीन है कि वो मेरी ज़बाँ समझता है

सलीम शहज़ाद

किसी रुत में जब मुस्कुराता है तू

सलीम शहज़ाद

ज़ुल्मत है तो फिर शो'ला-ए-शब-गीर निकालो

सलीम शाहिद

मत पूछ कि इस पैकर-ए-ख़ुश-रंग में क्या है

सलीम शाहिद

मंज़र मिरी आँखों में रहे दश्त-ए-सफ़र के

सलीम शाहिद

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