गुल Poetry (page 35)

उमीदें मिट गईं अब हम-नफ़स क्या

सफ़िया शमीम

कोई आबाद मंज़िल हम जो वीराँ देख लेते हैं

सफ़ी लखनवी

चारों ओर अब फूल ही फूल हैं क्या गिनते हो दाग़ों को

सफ़दर मीर

कुछ हक़ीक़त तो हुआ करती थी इंसानों में

सईद अहमद अख़्तर

इक बर्ग-ए-ख़ुश्क से गुल-ए-ताज़ा तक आ गए

सईद अहमद

ऐ ख़ूब-रू फ़रिश्ता सियर-अंजुमन में आ

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

शिकस्त-ए-आबला-ए-दिल में नग़्मगी है बहुत

सादिक़ नसीम

रश्क-ए-महताब जहाँ-ताब था हर क़र्या-ए-जाँ

सादिक़ नसीम

नज़र नज़र से वो कलियाँ खिला खिला भी गया

सादिक़ नसीम

किस मुँह से ज़िंदगी को वो रख़्शंदा कह सकें

सादिक़ नसीम

अज़मत-ए-फ़िक्र के अंदाज़ अयाँ भी होंगे

सादिक़ नसीम

एक इक लम्हा मुझे ज़ीस्त से बे-ज़ारी है

सादिक़ इंदौरी

आग थी ऐसी कि अरमाँ जल गए

सदफ़ जाफ़री

न ज़िक्र गुल का कहीं है न माहताब का है

सदा अम्बालवी

न ज़िक्र गुल का कहीं है न माहताब का है

सदा अम्बालवी

लाख तक़दीर पे रोए कोई रोने वाला

सदा अम्बालवी

पहला पत्थर याद हमेशा रहता है

साबिर वसीम

कैसी मअनी की क़बा रिश्तों को पहनाई गई

साबिर अदीब

ये सैल-ए-अश्क मुझे गुफ़्तुगू की ताब तो दे

सबिहा सबा, न्यूयार्क

किस को बताते किस से छुपाते सुराग़-ए-दिल

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

यगाना बन के हो जाए वो बेगाना तो क्या होगा

सबा अकबराबादी

पूछें तिरे ज़ुल्म का सबब हम

सबा अकबराबादी

मंज़िल पे पहुँचने का मुझे शौक़ हुआ तेज़

सबा अकबराबादी

जुनूँ में गुम हुए होश्यार हो कर

सबा अकबराबादी

जो हमारे सफ़र का क़िस्सा है

सबा अकबराबादी

जो देखिए तो करम इश्क़ पर ज़रा भी नहीं

सबा अकबराबादी

हुस्न जो रंग ख़िज़ाँ में है वो पहचान गया

सबा अकबराबादी

ख़िज़ाँ का जो गुलशन से पड़ जाए पाला

साइल देहलवी

बसा-औक़ात आ जाते हैं दामन से गरेबाँ में

साइल देहलवी

हम कि चेहरे पे न लाए कभी वीरानी को

सादुल्लाह शाह

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