हाल Poetry (page 9)

ब-फ़ैज़-ए-आगही है मुद्दआ संजीदा संजीदा

सय्यद जमील मदनी

शिकवे ज़बाँ पे आ सकें इस का सवाल ही न हो

सय्यद हामिद

मसर्रत में भी है पिन्हाँ अलम यूँ भी है और यूँ भी

सय्यद हामिद

हमारे ख़्वाब कुछ इनइकास लगता है

सय्यद फ़ज़लुल मतीन

लरज़ रहा था फ़लक अर्ज़-ए-हाल ऐसा था

सय्यद अमीन अशरफ़

वो जहाँ हैं वहीं ख़याल मिरा

स्वप्निल तिवारी

वो बे-रुख़ी कि तग़ाफ़ुल की इंतिहा कहिए

सुरूर बाराबंकवी

आईना देखना

सूरज नारायण मेहर

हमारे हाल की जा कर उन्हें ख़बर तो करें

सूरज नारायण

रक़्स करता है ब-अंदाज़-ए-जुनूँ दौड़ता है

सुल्तान अख़्तर

मुसीबत में भी ग़ैरत-आश्ना ख़ामोश रहती है

सुल्तान अख़्तर

इस एक सोच में गुम हैं ख़याल जितने हैं

सुलेमान ख़ुमार

ये भी शायद तिरा अंदाज़-ए-दिल-आराई है

सुलैमान अरीब

नहीं जो तेरी ख़ुशी लब पे क्यूँ हँसी आए

सुलैमान अरीब

दुनिया के कुछ न कुछ तो तलबगार से रहे

सुहैल अहमद ज़ैदी

दुनिया के कुछ न कुछ तो तलबगार से रहे

सुहैल अहमद ज़ैदी

जो कुछ हुआ सो हुआ अब सवाल ही क्या है

सुहा मुजद्ददी

दो आलम के आफ़ात से दूर कर दे

सुहा मुजद्ददी

शजर शजर निगराँ है कली कली बेदार

सूफ़ी तबस्सुम

मोहब्बत किस क़दर सेहर-आफ़रीं मालूम होती है

सूफ़ी तबस्सुम

ख़ामोशी कलाम हो गई है

सूफ़ी तबस्सुम

हर एक नक़्श तिरे पाँव का निशाँ सा है

सूफ़ी तबस्सुम

मुझे मलाल में रखना ख़ुशी तुम्हारी थी

सुबहान असद

हो गया आइना-ए-हाल भी गर्द-आलूदा

सिराज लखनवी

मुझे अब हवा-ए-चमन नहीं कि क़फ़स में गूना क़रार है

सिराज लखनवी

काफ़िरी में भी जो चाहत होगी

सिराज लखनवी

गुनाहगार हूँ ऐसा रह-ए-नजात में हूँ

सिराज लखनवी

तुझ पर फ़िदा हैं सारे हुस्न-ओ-जमाल वाले

सिराज औरंगाबादी

तिरी निगाह की अनियाँ जिगर में सलियाँ हैं

सिराज औरंगाबादी

शर्बत-ए-वस्ल पिला जा लब-ए-शीरीं की क़सम

सिराज औरंगाबादी

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