हाथ Poetry (page 56)

सितम के बा'द भी बाक़ी करम की आस तो है

दानिश फ़राही

शीशे से ज़ियादा नाज़ुक था ये शीशा-ए-दिल जो टूट गया

दानिश फ़राही

वाइज़ बड़ा मज़ा हो अगर यूँ अज़ाब हो

दाग़ देहलवी

निगह निकली न दिल की चोर ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं निकली

दाग़ देहलवी

क्यूँ वस्ल की शब हाथ लगाने नहीं देते

दाग़ देहलवी

हुआ है चार सज्दों पर ये दावा ज़ाहिदो तुम को

दाग़ देहलवी

हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगे

दाग़ देहलवी

चाक हो पर्दा-ए-वहशत मुझे मंज़ूर नहीं

दाग़ देहलवी

भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं

दाग़ देहलवी

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं

दाग़ देहलवी

क़रीने से अजब आरास्ता क़ातिल की महफ़िल है

दाग़ देहलवी

मुमकिन नहीं कि तेरी मोहब्बत की बू न हो

दाग़ देहलवी

मुझ सा न दे ज़माने को परवरदिगार दिल

दाग़ देहलवी

मोहब्बत का असर जाता कहाँ है

दाग़ देहलवी

मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है

दाग़ देहलवी

मज़े इश्क़ के कुछ वही जानते हैं

दाग़ देहलवी

कौन सा ताइर-ए-गुम-गश्ता उसे याद आया

दाग़ देहलवी

जल्वे मिरी निगाह में कौन-ओ-मकाँ के हैं

दाग़ देहलवी

होश आते ही हसीनों को क़यामत आई

दाग़ देहलवी

देख कर जौबन तिरा किस किस को हैरानी हुई

दाग़ देहलवी

भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं

दाग़ देहलवी

बाक़ी जहाँ में क़ैस न फ़रहाद रह गया

दाग़ देहलवी

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता

दाग़ देहलवी

अब वो ये कह रहे हैं मिरी मान जाइए

दाग़ देहलवी

दुनिया पत्थर फेंक रही है झुँझला कर फ़र्ज़ानों पर

डी. राज कँवल

मोहब्बत की गली से हम जहाँ हो कर निकल आए

चित्रांश खरे

या-रब ग़म-ए-हिज्राँ में इतना तो किया होता

चराग़ हसन हसरत

या-रब ग़म-ए-हिज्राँ में इतना तो किया होता

चराग़ हसन हसरत

जंग

चन्द्रभान ख़याल

कैसा वो मौसम था ये तो समझ न पाए हम

चंद्र प्रकाश शाद

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