हुआ Poetry (page 104)

रखना हमेशा याद ये मेरा कहा हुआ

राणा गन्नौरी

मसअले हल करते करते आदमी का ज़ेहन भी

राणा गन्नौरी

इस दौर-ए-ना-मुराद से ये तजरबा हुआ

राना आमिर लियाक़त

बना हुआ है हमारा कसी बहाने से

राना आमिर लियाक़त

थकन का बोझ बदन से उतारते हैं हम

रम्ज़ी असीम

ये ज़िंदगी सज़ा के सिवा और कुछ नहीं

रम्ज़ अज़ीमाबादी

निगाह तूर पे है और जमाल सीने में

रम्ज़ अज़ीमाबादी

जलने का हुनर सिर्फ़ फ़तीले के लिए था

रम्ज़ अज़ीमाबादी

इस सदी का जब कभी ख़त्म-ए-सफ़र देखेंगे लोग

रम्ज़ अज़ीमाबादी

तुम्हारा क़ुर्ब वजह-ए-इज़्तिराब-ए-दिल न बन जाए

रम्ज़ आफ़ाक़ी

ज़िंदगी इन दिनों उदास कहाँ

रमेश कँवल

तुझ से मैं मुझ से आश्ना तुम हो

रमेश कँवल

अपनों के दरमियान सलामत नहीं रहे

रमेश कँवल

रौशनी वाले तो दुनिया देखें

राम रियाज़

लफ़्ज़ बे-जाँ हैं मिरे रूह-ए-मआनी मुझे दे

राम रियाज़

आँखों में तेज़ धूप के नेज़े गड़े रहे

राम रियाज़

किस ने कहा था शहर में आ कर आँख लड़ाओ दीवारों से

राम प्रकाश राही

तुझे अच्छा बुरा जैसा लगा हूँ

राम नाथ असीर

फिर भीग चलीं आँखें चलने लगी पुर्वाई

राम कृष्ण मुज़्तर

दिल-ओ-नज़र में न पैदा हुई शकेबाई

राम कृष्ण मुज़्तर

दर्द-ए-हयात-ए-इश्क़ है नग़्मा-ए-जाँ-गुदाज़ में

राम कृष्ण मुज़्तर

रू-पोश आँख से कोई ख़ुशबू लिबास है

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

राज़-ए-हस्ती से आश्ना न हुआ

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

जो भी देना है वो ख़ुदा देगा

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

चराग़ बुझने लगे और छाई तारीकी

राकिब मुख़्तार

अजब नहीं है मुआलिज शिफ़ा से मर जाएँ

राकिब मुख़्तार

माँग लेना सिला तो जाएज़ है

रख़्शंदा नवेद

ग़मी ख़ुशी बाँटी थी अपने बिस्तर से

रख़्शंदा नवेद

वो जो होती थी फ़ज़ा-ए-दास्तानी ले गया

रख़शां हाशमी

वही इक मौसम-ए-सफ़्फ़ाक था अंदर भी बाहर भी

राजेन्द्र मनचंदा बानी

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