हुआ Poetry (page 146)

वो बस्ती याद आती है

फ़ारूक़ बख़्शी

शहर-ए-दोस्त

फ़ारूक़ बख़्शी

रेज़ा रेज़ा सा भला मुझ में बिखरता क्या हे

फ़ारूक़ बख़्शी

ख़ुदा करे कि ये मिट्टी बिखर भी जाए अब

फ़ारूक़ बख़्शी

कैसे इन सच्चे जज़्बों की अब उस तक तफ़्हीम करूँ

फ़ारूक़ बख़्शी

इक पल कहीं रुके थे सफ़र याद आ गया

फ़ारूक़ बख़्शी

ख़ाली नहीं है कोई यहाँ पर अज़ाब से

फ़ारूक़ अंजुम

जो बैठो सोचने हर ज़ख़्म-ए-दिल कसकता है

फ़ारूक़ अंजुम

मचलती है मिरे सीने में तेरी आरज़ू क्या क्या

फ़रोग़ हैदराबादी

यादों का अजीब सिलसिला है

फ़ारिग़ बुख़ारी

क्या अदू क्या दोस्त सब को भा गईं रुस्वाइयाँ

फ़ारिग़ बुख़ारी

जंगल उगा था हद्द-ए-नज़र तक सदाओं का

फ़ारिग़ बुख़ारी

इस औज पर न उछालो मुझे हवा कर के

फ़ारिग़ बुख़ारी

हर एक रास्ते का हम-सफ़र रहा हूँ मैं

फ़ारिग़ बुख़ारी

देखे कोई जो चाक-ए-गरेबाँ के पार भी

फ़ारिग़ बुख़ारी

देखा तुझे तो आँखों ने ऐवाँ सजा लिए

फ़ारिग़ बुख़ारी

अपने ही साए में था में शायद छुपा हुआ

फ़ारिग़ बुख़ारी

जब तक चराग़-ए-शाम-ए-तमन्ना जले चलो

फ़रहत शहज़ाद

शुऊर-ओ-फ़िक्र की तज्दीद का गुमाँ तो हुआ

फ़रहत क़ादरी

कोई अहद-ए-वफ़ा भूला हुआ हूँ

फ़रहत नदीम हुमायूँ

है वही एक मेरे सिवा और मैं

फ़रहत नदीम हुमायूँ

मुँह-बोला बोल जगत का है जो मन में रहे सो अपना है

फ़रहत कानपुरी

ये धड़कता हुआ दिल उस के हवाले कर दूँ

फ़रहत एहसास

वो चाँद कह के गया था कि आज निकलेगा

फ़रहत एहसास

हर गली कूचे में रोने की सदा मेरी है

फ़रहत एहसास

एक रात वो गया था जहाँ बात रोक के

फ़रहत एहसास

लहर का ठहराओ

फ़रहत एहसास

ख़ुद-आगही

फ़रहत एहसास

बिछड़े घर का साया

फ़रहत एहसास

बैज़ा-ए-नूर

फ़रहत एहसास

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