प्रेम Poetry (page 40)
कैसे करूँ मैं ज़ब्त-ए-राज़ तू ही मुझे बता कि यूँ
एस ए मेहदी
कैफ़-ए-सुरूर-ओ-सोज़ के क़ाबिल नहीं रहा
एस ए मेहदी
पुर-हौल ख़राबों से शनासाई मिरी है
रूही कंजाही
ये एहतियात इश्क़ पे लाज़िम सदा रहे
रोहित सोनी ‘ताबिश’
शुऊर-ए-इश्क़ अगर फ़ितरत-ए-निगाह में है
रोहित सोनी ‘ताबिश’
निकालो कोई तो सूरत कि तीरगी कम हो
रोहित सोनी ‘ताबिश’
हवा-ए-जिंदगी भी कूचा-ए-क़ातिल से आती है
रोहित सोनी ‘ताबिश’
गरचे मिरे ख़ुलूस से वो बे-ख़बर न था
रोहित सोनी ‘ताबिश’
तुम्हारी याद तुम्हारा ख़याल काफ़ी है
रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान
कोई ख़्वाब था जो बिखर गया कोई दर्द था जो ठहर गया
रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान
मेरी सज-धज तो कोई इश्क़-ए-बुताँ में देखे
रियाज़ ख़ैराबादी
अब मुजरिमान-ए-इश्क़ से बाक़ी हूँ एक मैं
रियाज़ ख़ैराबादी
ज़रूर पाँव में अपने हिना वो मल के चले
रियाज़ ख़ैराबादी
ये कहाँ से हम गए हैं कहाँ कहें क्या तिरी तग-ओ-ताज़ में
रियाज़ ख़ैराबादी
उस हुस्न का शैदा हूँ उस हुस्न का दीवाना
रियाज़ ख़ैराबादी
रंग पर कल था अभी लाला-ए-गुलशन कैसा
रियाज़ ख़ैराबादी
पाया जो तुझे तो खो गए हम
रियाज़ ख़ैराबादी
न आया हमें इश्क़ करना न आया
रियाज़ ख़ैराबादी
जफ़ा में नाम निकालो न आसमाँ की तरह
रियाज़ ख़ैराबादी
हंस के पैमाना दिया ज़ालिम ने तरसाने के बा'द
रियाज़ ख़ैराबादी
दुनिया से अलग हम ने मयख़ाने का दर देखा
रियाज़ ख़ैराबादी
दर खुला सुब्ह को पौ फटते ही मय-ख़ाने का
रियाज़ ख़ैराबादी
था मुक़द्दम इश्क़-ए-बुत इस्लाम पर तिफ़्ली में भी
रिन्द लखनवी
रिंदान-ए-इश्क़ छुट गए मज़हब की क़ैद से
रिन्द लखनवी
साइलाना उन के दर पर जब मिरा जाना हुआ
रिन्द लखनवी
सदमे गुज़रे ईज़ा गुज़री
रिन्द लखनवी
नीस्त बे-यार मुझ को हस्ती है
रिन्द लखनवी
न अंगिया न कुर्ती है जानी तुम्हारी
रिन्द लखनवी
लाला-रूयों से कब फ़राग़ रहा
रिन्द लखनवी
क्यूँ-कर न लाए रंग गुलिस्ताँ नए नए
रिन्द लखनवी
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