प्रेम Poetry (page 42)

मुहक़क़िक़

रज़ा नक़वी वाही

वास्ता कोई न रख कर भी सितम ढाते हो तुम

रज़ा लखनवी

ख़याल-ए-हुस्न में यूँ ज़िंदगी तमाम हुई

रज़ा लखनवी

ये बात तिरी चश्म-ए-फुसूँ-कार ही समझे

रज़ा जौनपुरी

उन की निगाह-ए-नाज़ के क़ाबिल कहें जिसे

रज़ा जौनपुरी

जिंस-ए-गिराँ का मैं हूँ ख़रीदार दोस्तो

रज़ा जौनपुरी

दिल को मामूर करो जज़्ब-ओ-असर से पहले

रज़ा जौनपुरी

ख़राब-ए-इश्क़ सही आलम-ए-शुहूद में हूँ

रज़ा हमदानी

सब कुछ पढ़ाया हम को मुदर्रिस ने इश्क़ के

रज़ा अज़ीमाबादी

नौ-मश्क़-ए-इश्क़ हैं हम आहें करें अजब क्या

रज़ा अज़ीमाबादी

हम को मिली है इश्क़ से इक आह-ए-सोज़-नाक

रज़ा अज़ीमाबादी

यार को बेबाकी में अपना सा हम ने कर लिया

रज़ा अज़ीमाबादी

उस चश्म ने कि तूतियों को नुक्ता-दाँ किया

रज़ा अज़ीमाबादी

शर्मिंदा नहीं कौन तिरी इश्वा-गरी का

रज़ा अज़ीमाबादी

मैं ही नहीं हूँ बरहम उस ज़ुल्फ़-ए-कज-अदा से

रज़ा अज़ीमाबादी

क्या न-दीदों से ज़माने को सरोकार है आज

रज़ा अज़ीमाबादी

इस तरह बज़्म में वस्फ़-ए-रुख़-ए-जानाना करूँ

रज़ा अज़ीमाबादी

हम मर गए प शिकवे की मुँह पर न आई बात

रज़ा अज़ीमाबादी

अब्र के बिन देखे हरगिज़ ख़ुश दिल-ए-मस्ताँ न हो

रज़ा अज़ीमाबादी

पचास सालों में दो इक बरस का रिश्ता था

रज़ा अश्क

जो राह अहल-ए-ख़िरद के लिए है ला-महदूद

रविश सिद्दीक़ी

हज़ार हुस्न दिल-आरा-ए-दो-जहाँ होता

रविश सिद्दीक़ी

बुतान-ए-शहर को ये ए'तिराफ़ हो कि न हो

रविश सिद्दीक़ी

वो बर्क़-ए-नाज़ गुरेज़ाँ नहीं तो कुछ भी नहीं

रविश सिद्दीक़ी

उम्र-ए-अबद से ख़िज़्र को बे-ज़ार देख कर

रविश सिद्दीक़ी

सुकूँ है हमनवा-ए-इज़्तिराब आहिस्ता आहिस्ता

रविश सिद्दीक़ी

शिकस्त-ए-रंग-ए-तमन्ना को अर्ज़-ए-हाल कहूँ

रविश सिद्दीक़ी

सवाल-ए-इश्क़ पर ता-हश्र चुप रहना पड़ा मुझ को

रविश सिद्दीक़ी

रंग उस महफ़िल-ए-तमकीं में जमाया न गया

रविश सिद्दीक़ी

रंग पर जब वो बज़्म-ए-नाज़ आई

रविश सिद्दीक़ी

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