प्रेम Poetry (page 44)

तर्क-ए-सितम पे वो जो क़सम खा के रह गए

रशीद रामपुरी

मिरा नाम क़ैस क्यूँ कर तिरे नाम तक न पहुँचे

रशीद रामपुरी

हैं बे-नियाज़-ए-ख़ल्क़ तिरा दर है और हम

रशीद रामपुरी

है निहायत सख़्त शान-ए-इम्तिहान-ए-कू-ए-दोस्त

रशीद रामपुरी

दिल की क्या क़द्र हो मेहमाँ कभी आए न गए

रशीद रामपुरी

दिल इश्क़ में उन के हारते हैं

रशीद रामपुरी

वस्ल के दिन का इशारा है कि ढल जाऊँगा

रशीद लखनवी

ठहर जावेद के अरमाँ दिल-ए-मुज़्तर निकलते हैं

रशीद लखनवी

ख़ार-ओ-ख़स फेंके चमन के रास्ते जारी करे

रशीद लखनवी

जो मुझे मर्ग़ूब हो वो सोगवारी चाहिए

रशीद लखनवी

जो हवा है सूरत-ए-बाद-ए-मुख़ालिफ़ तेज़ है

रशीद लखनवी

हम अजल के आने पर भी तिरा इंतिज़ार करते

रशीद लखनवी

हिज्र है अब था यहीं में ज़ार हम पहलू-ए-दोस्त

रशीद लखनवी

है बे-ख़ुद वस्ल में दिल हिज्र में मुज़्तर सिवा होगा

रशीद लखनवी

गर्म रफ़्तार है तेरी ये पता देते हैं

रशीद लखनवी

दिल हमारा जानिब-ए-ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम आएगा

रशीद लखनवी

कौन सा इश्क़-ए-बुताँ में हमें सदमा न हुआ

रसा रामपुरी

जी चाहा जिधर छोड़ दिया तीर अदा को

रसा रामपुरी

तिरे नज़दीक आ कर सोचता हूँ

रसा चुग़ताई

'मीर'-जी से अगर इरादत है

रसा चुग़ताई

कोई ता'मीर की सूरत निकालो

रसा चुग़ताई

हम ने तो इस इश्क़ में यारो खींचे हैं आज़ार बहुत

रसा चुग़ताई

सौदा-ए-सज्दा शाम-ओ-सहर मेरे सर में है

रंजूर अज़ीमाबादी

मैं और हम-आग़ोश हूँ उस रश्क-ए-परी से

रंजूर अज़ीमाबादी

देता है मुझ को चर्ख़-ए-कुहन बार बार दाग़

रंजूर अज़ीमाबादी

गर्म इन रोज़ों में कुछ इश्क़ का बाज़ार नहीं

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

ता हश्र रहे ये दाग़ दिल का

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

इश्क़ से बच के किधर जाएँगे हम

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

गर्म इन रोज़ों में कुछ इश्क़ का बाज़ार नहीं

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

चाह कर हम उस परी-रू को जो दीवाने हुए

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

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