प्रेम Poetry (page 39)

न ज़िक्र गुल का कहीं है न माहताब का है

सदा अम्बालवी

ये ज़ख़्म-ए-इश्क़ है कोशिश करो हरा ही रहे

साबिर ज़फ़र

हर दर्जे पे इश्क़ कर के देखा

साबिर ज़फ़र

गुज़ारता हूँ जो शब इश्क़-ए-बे-मआश के साथ

साबिर ज़फ़र

क़िस्मत में अगर जुदाइयाँ हैं

साबिर ज़फ़र

ख़ुमार-ए-शब में जो इक दूसरे पे गिरते हैं

साबिर ज़फ़र

हर एक मरहला-ए-दर्द से गुज़र भी गया

साबिर ज़फ़र

गुल ओ महताब लिखना चाहता हूँ

साबिर वसीम

इदराक ही मुहाल है ख़्वाब-ओ-ख़याल का

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

हम ने ख़ाक-ए-दर-ए-महबूब जो चेहरे पे मली

सबा जायसी

टुकड़े हुए थे दामन-ए-हस्ती के जिस क़दर

सबा अकबराबादी

कौन उठाए इश्क़ के अंजाम की जानिब नज़र

सबा अकबराबादी

कब तक यक़ीन इश्क़ हमें ख़ुद न आएगा

सबा अकबराबादी

काम आएगी मिज़ाज-ए-इश्क़ की आशुफ़्तगी

सबा अकबराबादी

जब इश्क़ था तो दिल का उजाला था दहर में

सबा अकबराबादी

यगाना बन के हो जाए वो बेगाना तो क्या होगा

सबा अकबराबादी

उस को भी हम से मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं

सबा अकबराबादी

सोना था जितना अहद-ए-जवानी में सो लिए

सबा अकबराबादी

पूरी मिरे जुनूँ की ज़रूरत न कर सके

सबा अकबराबादी

जो देखिए तो करम इश्क़ पर ज़रा भी नहीं

सबा अकबराबादी

चला-चल मोहलत-ए-आराम क्या है

सबा अकबराबादी

अश्क-बारी नहीं फ़ुर्क़त में शरर-बारी है

सबा अकबराबादी

अजल होती रहेगी इश्क़ कर के मुल्तवी कब तक

सबा अकबराबादी

कारवाँ लुट गया राहबर छुट गया रात तारीक है ग़म का यारा नहीं

सबा अफ़ग़ानी

होश-ओ-ख़िरद से दूर हूँ सूद-ओ-ज़ियाँ से दूर

सबा अफ़ग़ानी

ज़ोम न कीजो शम्अ-रू बज़्म के सोज़ ओ साज़ पर

साइल देहलवी

जताते रहते हैं ये हादसे ज़माने के

साइल देहलवी

मुझ सा कोई जहान में नादान भी न हो

सादुल्लाह शाह

नाव काग़ज़ की सही कुछ तो नज़र से गुज़रे

सादुल्लाह कलीम

जिंस-ए-वफ़ा का दहर में बाज़ार गिर गया

एस ए मेहदी

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