खफा Poetry (page 10)

बुत-ए-काफ़िर जो तू मुझ से ख़फ़ा हो

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बुत-ए-काफ़िर जो तू मुझ से ख़फ़ा है

भारतेंदु हरिश्चंद्र

लड़ाएँ आँख वो तिरछी नज़र का वार रहने दें

बेख़ुद देहलवी

बेवफ़ा कहने से क्या वो बेवफ़ा हो जाएगा

बेख़ुद देहलवी

तुम ख़फ़ा हो तो अच्छा ख़फ़ा हो

बेदम शाह वारसी

माना उस को गिला नहीं मुझ से

बशीर महताब

अजीब शख़्स है नाराज़ हो के हँसता है

बशीर बद्र

ये चराग़ बे-नज़र है ये सितारा बे-ज़बाँ है

बशीर बद्र

ख़ून पत्तों पे जमा हो जैसे

बशीर बद्र

दुआ करो कि ये पौदा सदा हरा ही लगे

बशीर बद्र

तुम कब थे क़रीब इतने मैं कब दूर रहा हूँ

बाक़ी सिद्दीक़ी

जाने क्यूँ उन से मिलते रहते हैं

बाक़र मेहदी

दुश्मन-ए-जाँ कोई बना ही नहीं

बाक़र मेहदी

दीवानगी की राह में गुम-सुम हुआ न था!

बाक़र मेहदी

दश्त-ए-वफ़ा में ठोकरें खाने का शौक़ था

बाक़र मेहदी

अजीब दिल में मिरे आज इज़्तिराब सा है!

बाक़र मेहदी

क्या कहें क्या हुस्न का आलम रहा

बक़ा बलूच

क्या कहूँ दिल माइल-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँकर हुआ

ज़फ़र

मेरी हर बात पे बे-बात ख़फ़ा होते हो

बीएस जैन जौहर

मेरी हर बात पे बे-बात ख़फ़ा होते हो

बीएस जैन जौहर

कैफ़ियत-ए-दिल-ए-हज़ीं हम से नहीं बयाँ हुई

बीएस जैन जौहर

तिरी महफ़िल में फ़र्क़-ए-कुफ़्र-ओ-ईमाँ कौन देखेगा

अज़ीज़ वारसी

क्यूँ ख़फ़ा हो क्यूँ इधर आते नहीं

अज़ीज़ हैदराबादी

सँभल न पाए तो तक़्सीर-ए-वाक़ई भी नहीं

अज़ीज़ हामिद मदनी

यही नहीं कि नज़र को झुकाना पड़ता है

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

वो मेरा यार था मुझ को न ये ख़याल आया

अज़हर इनायती

ज़रा सी देर तुझे आइना दिखाया है

अज़हर अदीब

फूलों से बहारों में जुदा थे तो हमीं थे

अतहर राज़

ख़िज़ाँ का मौसम

असरा रिज़वी

मैं सोचता हूँ कहीं तू ख़फ़ा न हो जाए

असलम फ़र्रुख़ी

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