लोग Poetry (page 29)

मुझे नहीं है कोई वहम अपने बारे में

इक़बाल साजिद

इस साल शराफ़त का लिबादा नहीं पहना

इक़बाल साजिद

इक तबीअत थी सो वो भी ला-उबाली हो गई

इक़बाल साजिद

वो निगाहों को जब बदलते हैं

इक़बाल सफ़ी पूरी

नगर में रहते थे लेकिन घरों से दूर रहे

इक़बाल मिनहास

कितने ही लोग दिल तलक आ कर गुज़र गए

इक़बाल मतीन

जिस तरह लोग ख़सारे में बहुत सोचते हैं

इक़बाल कौसर

जिस तरह लोग ख़सारे में बहुत सोचते हैं

इक़बाल कौसर

अफ़सोस माबदों में ख़ुदा बेचते हैं लोग

इक़बाल कैफ़ी

साहिल के तलबगार भी क्या ख़ूब रहे हैं

इक़बाल कैफ़ी

कैफ़-ए-हयात तेरे सिवा कुछ नहीं रहा

इक़बाल कैफ़ी

जो तेरे दर्द हैं वही सब मेरे दर्द हैं

इक़बाल हैदर

तुम ग़ैरों से हँस हँस के मुलाक़ात करो हो

इक़बाल अज़ीम

सब समझते हैं कि हम किस कारवाँ के लोग हैं

इक़बाल अज़ीम

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था सर-ए-बज़्म रात ये क्या हुआ

इक़बाल अज़ीम

कुछ ऐसे ज़ख़्म भी दर-पर्दा हम ने खाए हैं

इक़बाल अज़ीम

जिस अंजुमन में देखो बेगाने रह गए हैं

इक़बाल अज़ीम

हर-चंद गाम गाम हवादिस सफ़र में हैं

इक़बाल अज़ीम

बस हो चुका हुज़ूर ये पर्दे हटाइए

इक़बाल अज़ीम

अपने मरकज़ से अगर दूर निकल जाओगे

इक़बाल अज़ीम

अपना घर छोड़ के हम लोग वहाँ तक पहुँचे

इक़बाल अज़ीम

अब इसे क्या करे कोई आँखों में रौशनी नहीं

इक़बाल अज़ीम

जो लोग लौट के ख़ुद मेरे पास आए हैं

इक़बाल अशहर कुरेशी

ये ख़ौफ़ कम है मुझे और चमको जब तक हो

इक़बाल अशहर कुरेशी

सब तमन्नाओं से ख़्वाबों से निकल आए हैं

इक़बाल अशहर कुरेशी

धूम इतनी तिरे दीवाने मचा सकते हैं

इंशा अल्लाह ख़ान

मिटती क़द्रों में भी पाबंद-ए-वफ़ा हैं हम लोग

इंद्र मोहन मेहता कैफ़

ये शफ़क़ चाँद सितारे नहीं अच्छे लगते

इन्दिरा वर्मा

काश वो पहली मोहब्बत के ज़माने आते

इन्दिरा वर्मा

दिल से अपने ख़ुद-ब-ख़ुद कुछ पूछिए मेरे लिए

इन्दिरा वर्मा

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