लोग Poetry (page 48)

अभी तो कुछ लोग ज़िंदगी में हज़ार सायों का इक शजर हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

निसार यूँ तो हुआ तुझ पे नक़्द-ए-जाँ क्या क्या

अज़ीज़ हामिद मदनी

क्या हुए बाद-ए-बयाबाँ के पुकारे हुए लोग

अज़ीज़ हामिद मदनी

हिकायत-ए-हुस्न-ए-यार लिखना हदीस-ए-मीना-ओ-जाम कहना

अज़ीज़ हामिद मदनी

हवा आशुफ़्ता-तर रखती है हम आशुफ़्ता-हालों को

अज़ीज़ हामिद मदनी

फ़िराक़ से भी गए हम विसाल से भी गए

अज़ीज़ हामिद मदनी

बैठो जी का बोझ उतारें दोनों वक़्त यहीं मिलते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

शहर ख़्वाबों का सुलगता रहा और शहर के लोग

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

जिन को दीवार-ओ-दर भी ढक न सके

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

आज कम-अज़-कम ख़्वाबों ही में मिल के पी लेते हैं, कल

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

पड़ा है ज़िंदगी के इस सफ़र से साबिक़ा अपना

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

लहू से उठ के घटाओं के दिल बरसते हैं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

किस क़दर कम-असास हैं कुछ लोग

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

खोल रहे हैं मूँद रहे हैं यादों के दरवाज़े लोग

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हम कोई नादान नहीं कि बच्चों की सी बात करें

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मिलते जुलते हैं यहाँ लोग ज़रूरत के लिए

अज़हर नवाज़

शहर गुम-सुम रास्ते सुनसान घर ख़ामोश हैं

अज़हर नक़वी

एक इक साँस में सदियों का सफ़र काटते हैं

अज़हर नक़वी

घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए

अज़हर इक़बाल

क्या रह गया है शहर में खंडरात के सिवा

अज़हर इनायती

इस कार-ए-आगही को जुनूँ कह रहे हैं लोग

अज़हर इनायती

चौराहों का तो हुस्न बढ़ा शहर के मगर

अज़हर इनायती

ये क्या कि रंग हाथों से अपने छुड़ाएँ हम

अज़हर इनायती

तमाम शख़्सियत उस की हसीं नज़र आई

अज़हर इनायती

मयस्सर हो जो लम्हा देखने को

अज़हर इनायती

कुछ आरज़ी उजाले बचाए हुए हैं लोग

अज़हर इनायती

कभी क़रीब कभी दूर हो के रोते हैं

अज़हर इनायती

जब तक सफ़ेद आँधी के झोंके चले न थे

अज़हर इनायती

इस रास्ते में जब कोई साया न पाएगा

अज़हर इनायती

इस बार उन से मिल के जुदा हम जो हो गए

अज़हर इनायती

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