लोग Poetry (page 49)

बनाए ज़ेहन परिंदों की ये क़तार मिरा

अज़हर इनायती

ये लोग जा के कटी बोगियों में बैठ गए

अज़हर फ़राग़

ये जो रहते हैं बहुत मौज में शब भर हम लोग

अज़हर फ़राग़

मैं जानता हूँ मुझे मुझ से माँगने वाले

अज़हर फ़राग़

हमारे ज़ाहिरी अहवाल पर न जा हम लोग

अज़हर फ़राग़

गिरते पेड़ों की ज़द में हैं हम लोग

अज़हर फ़राग़

रात की आग़ोश से मानूस इतने हो गए

अज़हर फ़राग़

धूप में साया बने तन्हा खड़े होते हैं

अज़हर फ़राग़

डरे हुए हैं सभी लोग अब्र छाने से

अज़हर फ़राग़

भँवर से ये जो मुझे बादबान खींचता है

अज़हर फ़राग़

भँवर से ये जो मुझे बादबान खींचता है

अज़हर फ़राग़

वो शब के साए में फ़स्ल-ए-नशात काटते हैं

अज़हर अदीब

क्या तेरा क्या मेरा ख़्वाब

अज़हर अदीब

कुछ अब के रस्म-ए-जहाँ के ख़िलाफ़ करना है

अज़हर अदीब

जगह फूलों की रखते हैं घना साया बनाते हैं

अज़हर अदीब

मुझ को इतना तो यक़ीं है मैं हूँ

अज़हर अब्बास

जब तिरे ख़्वाब से बेदार हुआ करते थे

अज़हर अब्बास

ऐसे पामाल कि पहचान में आते ही नहीं

अज़हर अब्बास

ये और बात है कि मदावा-ए-ग़म न था

अज़ीम मुर्तज़ा

दिल को रहीन-ए-लज़्ज़त-ए-दरमाँ न कर सके

आज़म चिश्ती

उश्शाक़ बहुत हैं तिरे बीमार बहुत हैं

अय्यूब ख़ावर

सोचों में लहू उछालते हैं

अय्यूब ख़ावर

लहरों में बदन उछालते हैं

अय्यूब ख़ावर

आख़िर बिगड़ गए मिरे सब काम होने तक

औरंगज़ेब

गह मश्क़-ए-सितम गाह-ए-करम याद करेंगे

औलाद अली रिज़वी

क़ल्ब-गह में ज़रा ज़रा सा कुछ

अतीक़ुल्लाह

दे कर पिछली यादों का अम्बार मुझे

अतीक़ुल्लाह

बहुत दिनों में कहीं रास्ते बदलते थे

अतीक़ुल्लाह

दुनिया से हुए बैठे हो रू-पोश ऐ जाना

आतिफ़ ख़ान

सौ रंग है किस रंग से तस्वीर बनाऊँ

अतहर नफ़ीस

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