उम्र Poetry (page 47)

न मेहराब-ए-हरम समझे न जाने ताक़-ए-बुत-ख़ाना

बेदम शाह वारसी

काश मिरी जबीन-ए-शौक़ सज्दों से सरफ़राज़ हो

बेदम शाह वारसी

जिगर-गुदाज़ मआ'नी समझ सको तो कहूँ

बेबाक भोजपुरी

कहता है कौन हिज्र मुझे सुब्ह ओ शाम हो

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

हम जैसे तेग़-ए-ज़ुल्म से डर भी गए तो क्या

बासिर सुल्तान काज़मी

ख़ुद अपना ए'तिबार गँवाता रहा हूँ मैं

बशीर सैफ़ी

इक लम्हा भी गुज़ारूँ भला क्यूँ किसी के साथ

बशीर महताब

अजब सी आग थी जलता रहा बदन सारा

बशीर फ़ारूक़ी

मैं जितनी देर तिरी याद में उदास रहा

बशीर फ़ारूक़ी

बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे

बशीर बद्र

ये ज़र्द पत्तों की बारिश मिरा ज़वाल नहीं

बशीर बद्र

वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है

बशीर बद्र

पिछली रात की नर्म चाँदनी शबनम की ख़ुनकी से रचा है

बशीर बद्र

मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे

बशीर बद्र

जब तक निगार-ए-दाश्त का सीना दुखा न था

बशीर बद्र

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा

बशीर बद्र

या मह-ओ-साल की दीवार गिरा दी जाए

बशीर अहमद बशीर

जब छाई घटा लहराई धनक इक हुस्न-ए-मुकम्मल याद आया

बशर नवाज़

बाज़ार-ए-ज़िंदगी में जमे कैसे अपना रंग

बशर नवाज़

देख कर तूल-ए-शब-ए-हिज्र दुआ करता हूँ

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

वहशत में भी रुख़ जानिब-ए-सहरा न करेंगे

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

न कोई उन के सिवा और जान-ए-जाँ देखा

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

जब अयाँ सुब्ह को वो नूर-ए-मुजस्सम हो जाए

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

फ़ासले ऐसे कि इक उम्र में तय हो न सकें

बाक़र मेहदी

धरती का बोझ

बाक़र मेहदी

मैं भाग के जाऊँगा कहाँ अपने वतन से

बाक़र मेहदी

क्या क्या नहीं किया मगर उन पर असर नहीं

बाक़र मेहदी

अश्क मेरे हैं मगर दीदा-ए-नम है उस का

बाक़र मेहदी

क्यूँ कर न ऐसे जीने से या रब मलूल हूँ

बाक़र आगाह वेलोरी

क्या पूछते हो मैं कैसा हूँ

बक़ा बलूच

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