उम्र Poetry (page 49)

हयात-ओ-काएनात पर किताब लिख रहे थे हम

अज़ीज़ नबील

अगरचे ज़ेहन के कश्कोल से छलक रहे थे

अज़ीज़ नबील

बचपने की याद

अज़ीज़ लखनवी

काश सुनते वो पुर-असर बातें

अज़ीज़ लखनवी

कर चुके बर्बाद दिल को फ़िक्र क्या अंजाम की

अज़ीज़ लखनवी

नाले दम लेते नहीं या-रब फ़ुग़ाँ रुकती नहीं

अज़ीज़ हैदराबादी

नरमी हवा की मौज-ए-तरब-ख़ेज़ अभी से है

अज़ीज़ हामिद मदनी

हरम का आईना बरसों से धुँदला भी है हैराँ भी

अज़ीज़ हामिद मदनी

तमाम उम्र किसी और नाम से मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

निकल पड़े न कहीं अपनी आड़ से कोई

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

टटोलता हुआ कुछ जिस्म ओ जान तक पहुँचा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

न याद आया न भूला न सानेहा मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मैं उस की बात के लहजे का ए'तिबार करूँ

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

लिया है किस क़दर सख़्ती से अपना इम्तिहाँ हम ने

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हटा के मेज़ से इक रोज़ आईना मैं ने

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ज़ौक़-ए-अमल के सामने दूरी सिमट गई

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

सर पर मिरे उम्र-भर रही धूप

अज़हर सईद

मआल-ए-दोस्ती कहिए हदीस-ए-मह-वशाँ कहिए

अज़हर सईद

हलाकत-ए-दिल-ए-नाशाद राएगाँ भी नहीं

अज़हर सईद

पढ़िए सबक़ यही है वफ़ा की किताब का

अज़हर नवाज़

हर एक राह में इम्कान-ए-हादिसा है अभी

अज़हर नैयर

उदास उदास तबीअ'त जो थी बहलने लगी

अज़हर इनायती

फ़िक्र में हैं हमें बुझाने की

अज़हर इनायती

बनाए ज़ेहन परिंदों की ये क़तार मिरा

अज़हर इनायती

ख़ामोश ज़बाँ से जब तक़रीर निकलती है

अज़हर हाश्मी

कोई सिलसिला नहीं जावेदाँ तिरे साथ भी तिरे बा'द भी

अज़हर फ़राग़

कोई भी शक्ल मिरे दिल में उतर सकती है

अज़हर फ़राग़

हँसने-हँसाने पढ़ने-पढ़ाने की उम्र है

अज़हर फ़राग़

अजीब लगता है यूँही बिछा हुआ बिस्तर

अज़हर अब्बास

ग़म का ये सलीक़ा भी रह गया है अब हम तक

अज़ीम मुर्तज़ा

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