उम्र Poetry (page 50)

ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!! आ दो घड़ी मिल कर रहें

आज़ाद गुलाटी

ये मैं था या मिरे अंदर का ख़ौफ़ था जिस ने

आज़ाद गुलाटी

आप जिस रह-गुज़र-ए-दिल से कभी गुज़रे थे

आज़ाद गुलाटी

साहिल पे रुक के सू-ए-समुंदर न देखिए

आज़ाद गुलाटी

ख़ुद हमीं को राहतों के कैफ़ का चसका न था

आज़ाद गुलाटी

कभी मिली जो तिरे दर्द की नवा मुझ को

आज़ाद गुलाटी

जो ग़म में जलते रहे उम्र-भर दिया बन कर

आज़ाद गुलाटी

हर इक शिकस्त को ऐ काश इस तरह मैं सहूँ

आज़ाद गुलाटी

गो मिरा साथ मिरी अपनी नज़र ने न दिया

आज़ाद गुलाटी

सात सुरों का बहता दरिया तेरे नाम

अय्यूब ख़ावर

हरीम-ए-हुस्न से आँखों के राब्ते रखना

अय्यूब ख़ावर

अश्क को दरिया बनाया आँख को साहिल किया

औरंगज़ेब

आख़िर बिगड़ गए मिरे सब काम होने तक

औरंगज़ेब

शिकस्ता-दिल की ख़ुशी दोस्तो ख़ुशी तो न थी

औलाद अली रिज़वी

गह मश्क़-ए-सितम गाह-ए-करम याद करेंगे

औलाद अली रिज़वी

तेरा ही निशान-ए-पा रहा हूँ मैं

अतीक़ुल्लाह

कौन गुज़रा था मेहराब-ए-जाँ से अभी ख़ामुशी शोर भरता हुआ

अतीक़ुल्लाह

आने वाला तो हर इक लम्हा गुज़र जाता है

अतीक़ुल्लाह

वो बात जिस से ये डर था खुली तो जाँ लेगी

आतिफ़ ख़ान

यक़ीन बरसों का इम्कान कुछ दिनों का हूँ

अतहर नासिक

चुप-चाप हब्स-ए-वक़्त के पिंजरे में मर गया

अतहर नासिक

करता मैं अब किसी से कोई इल्तिमास क्या

अतहर नादिर

कटी है उम्र यहाँ एक घर बनाने में

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

आई है जाने कैसे इलाक़ों से रौशनी

अतीक़ अहमद

तिरी आँखों में इक मुबहम फ़साना ढूँढ ही लेगा

अताउर्रहमान जमील

मंज़िलें भी ये शिकस्ता-बाल-ओ पर भी देखना

अताउल हक़ क़ासमी

कहीं जमाल-पज़ीरी की हद नहीं रखता

अता तुराब

यक लम्हा सही उम्र का अरमान ही रह जाए

अता शाद

मैं ज़ख़्म ज़ख़्म रहूँ रूह के ख़राबों से

अता शाद

चोब-ए-सहरा भी वहाँ रश्क-ए-समर कहलाए

अता शाद

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