रास्ता Poetry (page 57)

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

बिस्मिल अज़ीमाबादी

सब उम्र तो जारी नहीं रहता है सफ़र भी

बिस्मिल आग़ाई

जो दिल में उस को बसाए वो और कुछ न करे

बिमल कृष्ण अश्क

जिस्म में ख़्वाहिश न थी एहसास में काँटा न था

बिमल कृष्ण अश्क

एक ख़्वाब

बिलाल अहमद

धुँद

बिलाल अहमद

तिरी तलाश में निकला तो रास्ता हुआ मैं

बिलाल अहमद

समुंदरों को भी दरिया समझ रहे हैं हम

भारत भूषण पन्त

ख़्वाहिशों से वलवलों से दूर रहना चाहिए

भारत भूषण पन्त

माशूक़ हमें बात का पूरा नहीं मिलता

बेख़ुद देहलवी

हो के मजबूर आह करता हूँ

बेख़ुद देहलवी

बेताब रहें हिज्र में कुछ दिल तो नहीं हम

बेख़ुद देहलवी

रक़ीबों का मुझ से गिला हो रहा है

बेखुद बदायुनी

यूँ तो कहने को तिरी राह का पत्थर निकला

बेकल उत्साही

है ख़िरद-मंदी यही बा-होश दीवाना रहे

बहज़ाद लखनवी

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए

बहज़ाद लखनवी

मिरी दास्तान-ए-अलम तो सुन कोई ज़लज़ला नहीं आएगा

बेदिल हैदरी

ग़म-ए-आफ़ाक़ में आरिफ़ अगर करवट बदलता है

बेबाक भोजपुरी

सुब्ह क़यामत आएगी कोई न कह सका कि यूँ

बयान मेरठी

मिस्ल-ए-हुबाब-ए-बहर न इतना उछल के चल

बयान मेरठी

किसी के नक़्श-ए-क़दम का निशाँ नहीं मिलता

बासित भोपाली

है दुनिया में ज़बाँ मेरी अगर बंद

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

आज-कल के शबाब देखे हैं

बशीर महताब

तुम अभी शहर में क्या नए आए हो

बशीर बद्र

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है

बशीर बद्र

अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा

बशीर बद्र

यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो

बशीर बद्र

तारों भरी पलकों की बरसाई हुई ग़ज़लें

बशीर बद्र

सर-ए-राह कुछ भी कहा नहीं कभी उस के घर मैं गया नहीं

बशीर बद्र

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