रास्ता Poetry (page 58)
पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है
बशीर बद्र
किसी की याद में पलकें ज़रा भिगो लेते
बशीर बद्र
अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा
बशीर बद्र
अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ
बशीर बद्र
सोए हुए जज़्बों को जगा कर फिर वो शाम न आई
बशीर मुंज़िर
हर रोज़ ही दिन भर के झमेलों से निमट के
बशीर मुंज़िर
जुदा भी हो के वो इक पल कभी जुदा न हुआ
बशीर अहमद बशीर
तो ऐसा क्यूँ नहीं करते
बशर नवाज़
करोगे याद तो हर बात याद आएगी
बशर नवाज़
क्या क्या लोग ख़ुशी से अपनी बिकने पर तय्यार हुए
बशर नवाज़
हर नई रुत में नया होता है मंज़र मेरा
बशर नवाज़
ब-हर-उनवाँ मोहब्बत को बहार-ए-ज़िंदगी कहिए
बशर नवाज़
आहट पे कान दर पे नज़र इस तरह न थी
बशर नवाज़
असर ज़ुल्फ़ का बरमला हो गया
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
दिल जो सूरत-गर-ए-मअ'नी का सनम-ख़ाना बने
बर्क़ देहलवी
तुम ज़माने की राह से आए
बाक़ी सिद्दीक़ी
वक़्त रस्ते में खड़ा है कि नहीं
बाक़ी सिद्दीक़ी
तारे दर्द के झोंके बन कर आते हैं
बाक़ी सिद्दीक़ी
रंग-ए-दिल रंग-ए-नज़र याद आया
बाक़ी सिद्दीक़ी
नद्दी के उस पार खड़ा इक पेड़ अकेला
बाक़ी सिद्दीक़ी
जुनूँ की राख से मंज़िल में रंग क्या आए
बाक़ी सिद्दीक़ी
उदास बाम है दर काटने को आता है
बाक़ी अहमदपुरी
सामने सब के न बोलेंगे हमारा क्या है
बाक़ी अहमदपुरी
छोड़ कर कूचा-ए-मय-ख़ाना तरफ़ मस्जिद के
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
सिपाह-ए-इशरत पे फ़ौज-ए-ग़म ने जो मिल के मरकब बहम उठाए
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
रह-रवाँ कहते हैं जिस को जरस-ए-महमिल है
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
छुप के नज़रों से इन आँखों की फ़रामोश की राह
बक़ा उल्लाह 'बक़ा'
वो रिंद क्या कि जो पीते हैं बे-ख़ुदी के लिए
बाक़र मेहदी
मैं भाग के जाऊँगा कहाँ अपने वतन से
बाक़र मेहदी
दीवानगी की राह में गुम-सुम हुआ न था!
बाक़र मेहदी
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