रास्ता Poetry (page 66)

रंगीं बना के दामन-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर को मैं

अनवर सहारनपुरी

दीवार पर लिखा न पढ़ो और ख़ुश रहो

अनवर सदीद

तसव्वुर के सहारे यूँ शब-ए-ग़म ख़त्म की मैं ने

अनवर साबरी

तज्दीद-ए-रस्म-ओ-राह-ए-मुलाक़ात कीजिए

अनवर साबरी

न तन्हा नस्तरीन ओ नस्तरन से इश्क़ है मुझ को

अनवर साबरी

दर्द बढ़ता ही रहे ऐसी दवा दे जाओ

अनवर मसूद

कैसा मक़ाम आया मोहब्बत की राह में

अनवर जमाल अनवर

रात का क्या ज़िक्र है शाम-ओ-सहर आया नहीं

अनवर जमाल अनवर

क़याम-गाह न कोई न कोई घर मेरा

अनवर जलालपुरी

देखा जो मर्ग तो मरना ज़ियाँ न था

अनवर देहलवी

ये नर्म हाथ मरे हाथ में थमा दीजे

अनवर अंजुम

चुप बैठा में अक्सर सोचता रहता हूँ

अनवर अंजुम

ज़ख़्म-ए-नज़ारा ख़ून-ए-नज़र देखते रहो

अनवर मोअज़्ज़म

डूबते तारों से पूछो न क़मर से पूछो

अनवर मोअज़्ज़म

खुली हुई है जो कोई आसान राह मुझ पर

अंजुम सलीमी

उम्र की सारी थकन लाद के घर जाता हूँ

अंजुम सलीमी

मैं ख़ुद को मिस्मार कर के मलबा बना रहा हूँ

अंजुम सलीमी

मैं जब वजूद से होते हुए गुज़रता हूँ

अंजुम सलीमी

ख़ुद अपने हाथ से क्या क्या हुआ नहीं मिरे साथ

अंजुम सलीमी

कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं

अंजुम रहबर

आग बहते हुए पानी में लगाने आई

अंजुम रहबर

सितमगरों से डरूँ चुप रहूँ निबाह करूँ

अंजुम ख़लीक़

मिरे जुनूँ को हवस में शुमार कर लेगा

अंजुम ख़लीक़

चाहे तू शौक़ से मुझे वहशत-ए-दिल शिकार कर

अंजुम ख़लीक़

सर-ए-राह मिल के बिछड़ गए था बस एक पल का वो हादसा

अंजुम इरफ़ानी

तेशा-ब-कफ़ को आइना-गर कह दिया गया

अंजुम इरफ़ानी

जो न हों कुछ तशरीह-तलब कम होते हैं

अंजुम इरफ़ानी

फ़सील-ए-जिस्म पे शब-ख़ूँ शरारतें तेरी

अंजुम इरफ़ानी

बड़ी फ़र्ज़-आश्ना है सबा करे ख़ूब काम हिसाब का

अंजुम इरफ़ानी

और कुछ याद नहीं अब से न तब से पूछो

अंजुम इरफ़ानी

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