छाया Poetry (page 13)

गलियों में आज़ार बहुत हैं घर में जी घबराता है

रईस फ़रोग़

मैं जो तन्हा रह-ए-तलब में चला

रईस अमरोहवी

हम ने ऐ दोस्त रिफ़ाक़त से भला क्या पाया

रईस अमरोहवी

अब के बिखरा तो मैं यकजा नहीं हो पाऊँगा

राहुल झा

ख़ूब नासेह की नसीहत का नतीजा निकला

रहमत क़रनी

लहू आँखों में रौशन है ये मंज़र देखना अब के

राही कुरैशी

लोग यक-रंगी-ए-वहशत से भी उकताए हैं

राही मासूम रज़ा

सुनो तो आरिज़ा-ए-इख़तिलाज रहने दो

राही फ़िदाई

एहसास-ए-ज़िम्मेदारी बेदार हो रहा है

राही फ़िदाई

दिल के पर्दे पे चेहरे उभरते रहे मुस्कुराते रहे और हम सो गए

इरफ़ान सत्तार

छतों पे आग रही बाम-ओ-दर पे धूप रही

इक़बाल उमर

फेंक यूँ पत्थर कि सत्ह-ए-आब भी बोझल न हो

इक़बाल साजिद

दहर के अंधे कुएँ में कस के आवाज़ा लगा

इक़बाल साजिद

जब शाख़-ए-तमन्ना पे कोई फूल खिला है

इक़बाल मिनहास

जब साया भी शीशे की तरह टूट गया

इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी

बख़्शे न गए एक को बख़्शा न कभी

इक़बाल ख़ुसरो क़ादरी

ध्यान आया मुझे रात की तन्हा-सफ़री का

इक़बाल कौसर

मैं दर पे तिरे दर-ब-दरी से निकल आया

इक़बाल कौसर

हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते

इक़बाल अज़ीम

सोचता हूँ तिरी तस्वीर दिखा दूँ उस को

इक़बाल अशहर

रास्ता भूल गया एक सितारा अपना

इक़बाल अशहर

प्यास के बेदार होने का कोई रस्ता न था

इक़बाल अशहर

ज़ुल्फ़ को था ख़याल बोसे का

इंशा अल्लाह ख़ान

गली से तेरी जो टुक हो के आदमी निकले

इंशा अल्लाह ख़ान

बात के साथ ही मौजूद है टाल एक न एक

इंशा अल्लाह ख़ान

मुझे रंग दे न सुरूर दे मिरे दिल में ख़ुद को उतार दे

इन्दिरा वर्मा

वो संगलाख़ ज़मीनों में शेर कहता था

इम्तियाज़ साग़र

ताराज ख़्वाहिशों का मुदावा न हो सका

इम्तियाज़ अहमद

मैं शजर हूँ और इक पत्ता है तू

इमरान हुसैन आज़ाद

कोई मजनूँ कोई फ़रहाद बना फिरता है

इमरान आमी

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