रात Poetry (page 81)

पारसाई उन की जब याद आएगी

अमीरुल्लाह तस्लीम

चाहता हूँ पहले ख़ुद-बीनी से मौत आए मुझे

अमीरुल्लाह तस्लीम

सुर्ख़ सितारा

आमिर उस्मानी

ज़मीं के जिस्म पे यूँ यूरिश-ए-क़ज़ा कब तक

आमिर नज़र

शब को जब यूरिश-ए-विज्दान में आ जाते हैं

आमिर नज़र

कुछ सुलगते हुए ख़्वाबों की फ़रावानी है

आमिर नज़र

खुला है तेरे बदन का भी इस्तिआरा कुछ

आमिर नज़र

ख़ेमा-ए-जाँ को जो देखूँ तो शरर-बार लगे

आमिर नज़र

हमारे चेहरों में पिन्हाँ हैं ज़ाविए क्या क्या

आमिर नज़र

फ़िशार-ए-तीरह-शबी से सहर निकल आए

आमिर नज़र

दरून-ए-जिस्म की दीवार से उभरती है

आमिर नज़र

दरपेश तो हैं दीदा-ए-हैरान हज़ारों

आमिर नज़र

चश्म-ए-बे-कैफ़ में कारिंदा-ए-मंज़र न रहा

आमिर नज़र

अब तो लफ़्ज़ों के तक़ाज़ों का भरोसा न रहा

आमिर नज़र

न तो बे-करानी-ए-दिल रही न तो मद्द-ओ-जज़्र-ए-तलब रहा

अमीर हम्ज़ा साक़िब

ख़याल-ए-यार का सिक्का उछालने में गया

अमीर हम्ज़ा साक़िब

हम ने हज़ार फ़ासले जी कर तमाम शब

अमीता परसुराम 'मीता'

कम्बख़्त दिल ने इश्क़ को वहशत बना दिया

अमीता परसुराम 'मीता'

हया गिरती हुई दीवार थी कल शब जहाँ मैं था

अमीरुल इस्लाम हाशमी

वो इक लफ़्ज़ जो बे-सदा जाएगा

अमीर क़ज़लबाश

नज़र में हर दुश्वारी रख

अमीर क़ज़लबाश

हर गाम हादसा है ठहर जाइए जनाब

अमीर क़ज़लबाश

दर्द का शहर कहीं कर्ब का सहरा होगा

अमीर क़ज़लबाश

बसर होना बहुत दुश्वार सा है

अमीर क़ज़लबाश

आँखें खुली हुई हैं तो मंज़र भी आएगा

अमीर क़ज़लबाश

तूल-ए-शब-ए-फ़िराक़ का क़िस्सा न पूछिए

अमीर मीनाई

शब-ए-विसाल बहुत कम है आसमाँ से कहो

अमीर मीनाई

रोज़-ओ-शब याँ एक सी है रौशनी

अमीर मीनाई

रहा ख़्वाब में उन से शब भर विसाल

अमीर मीनाई

या-रब शब-ए-विसाल ये कैसा गजर बजा

अमीर मीनाई

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