रात Poetry (page 79)

क्या शहर में है गर्मी-ए-बाज़ार के सिवा

अनवर सिद्दीक़ी

सुलैमान-ए-सुख़न तो ख़ैर क्या हूँ

अनवर शऊर

आवारा हूँ रैन-बसेरा कोई नहीं मेरा

अनवर शऊर

वो नीची निगाहें वो हया याद रहेगी

अनवर साबरी

तसव्वुर के सहारे यूँ शब-ए-ग़म ख़त्म की मैं ने

अनवर साबरी

किसी सूरत भी नींद आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ

अनवर मिर्ज़ापुरी

हर दम दुआ-ए-आब-ओ-हवा माँगते रहे

अनवर मीनाई

क़याम-गाह न कोई न कोई घर मेरा

अनवर जलालपुरी

ज़ीने तो बस ज़ीने हैं

अनवार फ़ितरत

है भी और फिर नज़र नहीं आती

अनवर देहलवी

देखा जो मर्ग तो मरना ज़ियाँ न था

अनवर देहलवी

अब अपना हाल हम उन्हें तहरीर कर चुके

अनवर देहलवी

आँखें दिखाईं ग़ैर को मेरी ख़ता के साथ

अनवर देहलवी

हुआ करे अगर उस को कोई गिला होगा

अनवर अंजुम

चाँद तारे जिसे हर शब देखें

अनवर अंजुम

ज़ख़्म-ए-नज़ारा ख़ून-ए-नज़र देखते रहो

अनवर मोअज़्ज़म

डूबते तारों से पूछो न क़मर से पूछो

अनवर मोअज़्ज़म

आज कुछ यूँ शब-ए-तन्हाई का अफ़्साना चले

अनवर मोअज़्ज़म

दिन हो कि रात, कुंज-ए-क़फ़स हो कि सेहन-ए-बाग़

अंजुम रूमानी

दिन हो कि रात कुंज-ए-क़फ़स हो कि सेहन-ए-बाग़

अंजुम रूमानी

वो जब अपने लब खोलें

अंजुम लुधियानवी

वस्ल की रात वो तन्हा होगा

अंजुम लुधियानवी

ऐ शब-ए-ग़म जो हम भी घर जाएँ

अंजुम ख़याली

चाँद हम दोनों से मुशाबह है

अंजुम ख़लीक़

कितना ढूँडा उसे जब एक ग़ज़ल और कही

अंजुम ख़लीक़

चाहे तू शौक़ से मुझे वहशत-ए-दिल शिकार कर

अंजुम ख़लीक़

फ़सील-ए-जिस्म पे शब-ख़ूँ शरारतें तेरी

अंजुम इरफ़ानी

और कुछ याद नहीं अब से न तब से पूछो

अंजुम इरफ़ानी

जो शब भर आँसुओं से तर रहेगा

अंजुम आज़मी

बनाए सब ने इसी ख़ाक से दिए अपने

अंजुम अंसारी

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