व्यक्ति Poetry (page 28)

रात इक शख़्स बहुत याद आया

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

वक़्त जब राह की दीवार हुआ

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

उतर कर पानियों में चाँद महव-ए-रक़्स रहता है

अज़हर नक़वी

रह गया दीदा-ए-पुर-आब का सामाँ हो कर

अज़हर नक़वी

थी उस की बंद मुट्ठी में चिट्ठी दबी हुई

अज़हर नैयर

हुरूफ़ ख़ाली सदफ़ और निसाब ज़ख़्मों के

अज़हर नैयर

हर एक राह में इम्कान-ए-हादिसा है अभी

अज़हर नैयर

हैरान हूँ कि आज ये क्या हादिसा हुआ

अज़हर नैयर

हर एक शख़्स यहाँ महव-ए-ख़्वाब लगता है

अज़हर इक़बाल

ये बार-ए-ग़म भी उठाया नहीं बहुत दिन से

अज़हर इक़बाल

वो तड़प जाए इशारा कोई ऐसा देना

अज़हर इनायती

वो मेरा यार था मुझ को न ये ख़याल आया

अज़हर इनायती

तमाम शख़्सियत उस की हसीं नज़र आई

अज़हर इनायती

कुछ आरज़ी उजाले बचाए हुए हैं लोग

अज़हर इनायती

इस बुलंदी पे कहाँ थे पहले

अज़हर इनायती

घर का रस्ता जो भूल जाता हूँ

अज़हर इनायती

हमेशा वाहिद-ए-यकता बयाँ से गुज़रा है

अज़हर हाश्मी

गर इक़्तिदार-ए-सुकूँ इक़्तिदार-ए-वहशत है

अज़हर हाश्मी

आज़ुर्दा निगाहों पे ये मंज़र नहीं उतरा

अज़हर हाश्मी

ये शख़्स जो तुझे आधा दिखाई देता है

अज़हर अदीब

ये रात आख़िरी लोरी सुनाने वाली है

अज़हर अब्बास

क़दम क़दम निशान ढूँढता रहा

अज़हर अब्बास

किस ने कहा कि चुप हूँ मियाँ बोलता नहीं

अज़हर अब्बास

आज आईने में ख़ुद को देख कर याद आ गया

आज़ाद गुलाटी

रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया

आज़ाद गुलाटी

आने वाले हादसों के ख़ौफ़ से सहमे हुए

आज़ाद गुलाटी

चराग़-ए-क़ुर्ब की लौ से पिघल गया वो भी

अय्यूब ख़ावर

आ जाए न रात कश्तियों में

अय्यूब ख़ावर

अश्क को दरिया बनाया आँख को साहिल किया

औरंगज़ेब

निगाह कोई तो तूफ़ाँ में मेहरबान सी है

अतुल अजनबी

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